Monday, 9 May 2016

मम्मी डे (Mother's Day)

कल फेसबुक  पर  मम्मियों  को प्यार करने वालो का ताता  लगा हुआ था, जिनका  इस दुनिया में आना उस माँ ने लिखा , लोग उस माँ पर तरह तरह की बाते  लिख रहे थे, एक होड़  सी मच जाती है लोगो में ऐसे दिनों।
  जो  अपनी माँ को  दो वर्ष पहले ही वृद्धाआश्रम छोड़ आये थे उनका भी प्यार फुट फुट कर छलक रहा था, मुझे गुरेज उनके प्यार से नहीं इस दिखावे से है, आखिर किस बात का दिखावा ? क्या दस बीस  दोस्त माँ के प्यार वाली पोस्ट को लाइक  कर देंगे तो साबित होगा हमारा प्यार ? क्या हमारा पूरा प्यार बस एक दिन के लिए है, पश्चिमी  देशो में इस तरह के त्यौहार समझ में आते हैं जहां पुरे साल में ऐसे ही एक दो मौकों पर बेटे बेटियाँ  अपने माँ बाप से मिलते हैं, पर क्या हिंदुस्तान में इस एक विशेष दिन की कोई उपयोगिता है ? जहां मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः का पाठ  पढ़ाया जाता है और अब भी ज्यादातर लोगो द्वारा अनुसरित भी होता है, जहाँ  अब भी अधिकतर घरों में माँ बाप ही घर के बड़े हैं और बिना उनके घर, घर नहीं लगता। 
      पश्चिमी देशो से हम सीख  रहे हैं, ये अच्छी बात है, लेकिन क्या सीख रहे हैं ये देखने वाली बात है, हमने छोटे कपडे पहनना सीख लिया लेकिन हमने उन्हें देखने की मानसिकता अभी भी नहीं बदली, अभी भी हमारी निगाहे राह चलती लड़की को ऐसे ताड़ती हैं जैसे उस लड़की या महिला ने गुनाह कर दिया  हो सड़क पर निकल कर ,   हमने कभी पश्चिमी देशो के  समय प्रबंधन को  सीखने  की कोशिश नहीं करी, हम आज भी नौ बजे की मीटिंग में साढ़े नौ तक बमुश्किल पहुंचते  हैं , पर मैंने किसी अमेरिकन या अंग्रेज को एक मिनट की देरी से भी पहुंचते नहीं देखा। 
            ये अच्छी बात है कि  हमने मम्मी डे, पापा डे मनाना  सीख लिया, लेकिन हमने अपने प्यार का दायरा इतना घटा दिया है कि  वो इन्ही एक दो दिनों तक सिमट कर रह गया है, दिन ब  दिन वृद्धाश्रमों की बढ़ती तादाद इस बात की पुष्टि भी करती है, हमारे विचार इतने खुले हो गए हैं की माँ बाप हमरे घरों में बोझ बन गए हैं, हम बागान फिल्म देखते देखते आंसू तो बहाते  हैं पर अगले ही क्षण अपने घर में अपने बुजुर्गो से वैसा ही बर्ताव करते हैं।  अपनी भावनाओ को प्रकट करना अच्छी बात है, परन्तु बेमन की भावना भी बस दिखाने  मात्र के लिए होती है, हम दिखावटी के किस घुड़दौड़ में दौड़ रहे हैं, ये शायद हमें भी नहीं पता, शाम तक मुझे भी लगने लगा था कि  कही मैंने गुनाह तो नहीं किया अपनी माँ की फोटो फेसबुक पे ना  लगा के ?
हिंदुस्तान की पहचान यहाँ के रिश्तों की प्रगाढ़ता और संस्कारो के रूप में ही होती है, हम तो वैलेंटाइन भी पुरे दो महीने बसंत ऋतू के रूप में मनाते  हैं , फिर ये तो हमारे माँ बाप हैं, इनकी तस्वीर साल के ३६५ दिन भी हम अपने दिलोदिमाग में ले के चले तो भी हमें कम लगता है,
          मेरा बस इतना कहना है कि  हम दिखावा भी करे तो उसका जिसका अस्तित्व हो, सिर्फ दिखाने  के लिए न करे,  जिस दिन इस हिंदुस्तान में एक भी वृद्धाआश्रम नहीं रहेगा, उस दिन मैं  पुरे शान से mothers  डे , fathers  डे मनाऊंगा, पर उससे पहले मेरी हिम्मत नहीं .... 

Tuesday, 9 February 2016

नमस्कार मै रविश कुमार

नमस्कार मै  रविश कुमार , सालो पहले जब दिल्ली आया, करते कराते  सात हज़ार की नौकरी लगी, और  टीवी ट्यूनर के सहारे टीवी का शौक पूरा किया तो ये आवाज मेरे कानो में सबसे पहले पड़ी, फिर लगाव सा हो गया इस आवाज से, या यूँ कहु उस अंदाज से, बचपन में जो जूनून रविवार को नौ बजे दिन का था  वही फितूर अब हर रात  नौ बजे का हो गया था, मैंने गोविन्दाचार्य के अलावा किसी व्यक्ति विशेष के बारे में ना  कभी कुछ लिखा और ना  ही इतना सम्मोहित हुआ, पर उनसे भी पहले शायद मै  इस आवाज से सम्मोहित हुआ, बहुत सारे  एंकर  को देखा रविश की तरह हुकारी  भरते हुए, पर वो कानो को परेशान करने वाले ज्यादा लगे, पर जब वही  हुंकारी थोड़े बिहारी अंदाज में रविश लगाते हैं तो मज़ा आता है सुनने में। 
बहुत दिनों से सोच रहा था कुछ लिखू पर नही लिख रहा था, पर कल जब पूरी रात  रविश के साथ पत्रकारिता कि  तो आज रोक नही पाया लिखने से,  सुबह टहलते हुए मिलने से लेकर उनके घर पर ठेठ अंदाज में नहाने, खाने और झुग्गी झोपड़ी में घुस कर सवाल पूछने का सफर तय किया मैंने, बीच में फार्च्यूनर गाड़ी में सफर भी किया, और गप्पे भी लड़ाई, देश दुनिया की बाते  भी करी, कुछ दिनों पहले रविश से फोन पर बात हुयी थी,  उन्होंने कहा था देश तो राहुल और मोदी संभल ही लेंगे, हमारी क्या जरुरत है, उस मुद्दे पर भी बात हुयी,  मेरे ख्याल से ४-५ घंटो का सपना था,  कुल मिला के पुरे दिन एक दोस्त के साथ सफर तय किया, हालाँकि सारे  सपने सुबह के अलार्म के साथ खाक हो गए, और उस सपने का अंत जो मै  अब तक सिर्फ लड़कियों के लिए ही देखा करता था। 

मै  कभी रविश से मिला नही पर उनकी बातो  में खीझ से पता चलता है कि  कोई सपनो का भारत है इस इंसान के मन में, जिसके लिए वो कोशिश करता है, कभी टूट भी जाता है पर फिर वो सपने उसे उठ खड़े होने को मजबूर कर देते हैं , जब वो बड़े बड़े सेमिनार में बिहार के कुछ ठेठ शब्द का इस्तेमाल बड़े शान से करता है तो लगता है की ये कोई लिखी पढ़ी बात  नही बल्कि दिल की बाते  बोल रहा है, क्यूंकि इंसान भावुकता में ही अपने आधार से जुड़ता है. शायद यही देशी और शुद्ध अंदाज ही हम जैसे लोगो को और करीब लाता  है रविश के , हालाँकि ऐसी कई सारी  बाते और भी हैं, अब भला सोचिये कोई बड़ा पत्रकार भला ये सोच सकता है कि  ट्रेन  में बिहार, यु पी के लड़के काला  चश्मा , टी शर्ट पहन के क्यों  घूमते हैं  पुरी  ट्रेन  में, क्यूँ  नीरी  गर्मी  में  भी  ऑटो  में दोनों तरफ के परदे लगे हुए हैं,  ये रविश का अनुभव और दूरदर्शिता ही तो है जो जी  बी रोड के आसपास रहने वाले लोगो के बारे में सोचता है,
रविश से मेरा लगाव कुछ बातो से भी है जैसे ये लाइन शौके दीदार अगर है तो नजर पैदा कर, बचपन में कक्षा चार या पांच में हिंदी में पढ़ी  थी ये लाइन और गाहे बगाहे लोगो से बातचीत में चिपकाता रहता हु इसे ,और रविश की भी ये पसंदीदा लाइन है, हालाँकि मेरा और उनका कोई मुकाबला नही पर मुकाबले नही तो क्या मुलाकात से भी गए ??
खैर आगे कुछ समझ नही आ रहा कि  क्या लिखू तो बाकि जो है सो हइये  है !!!!

Thursday, 7 January 2016

मेरी नायिका

                                                             
       मै तो शब्दों की तलाश में ही भटक रहा था जालिम, और   तुम  किताबो का जखीरा ले आये,
आज पता चला कि तुम्हारा एक सपना पूरा हुआ, दुःख हुआ कि सपने सजोने का कारण तो बना पर पूरा करने में  साथ ना दे पाया, कारण कुछ भी रहे हो,  तुम दूर गयी या मै, अगर मै  अभी हुए   सुख और तुम्हारे जाने के बाद हुए दुःख दोनों को आँकू तो अभी हुए सुख से  खुश ज्यादा हूँ।   आज यूँ ही दिल उदास था,  शायद वो नायिका अपने नायक से कुछ कहना चाह रही हो पर कह तो नही सकती ना, ना कहने की कसम जो खा रखी है, उस उदासी में तुम्हे ढूढ़ते ढूढ़ते तुम्हारे सपनो की उड़ान तक पहुंच गया, जी किया अभी के अभी पूरी किताब बाच लूँ , पर ना पढ़ने का फैसला किया , हा तुम्हारा कवर नोट रोज पढूंगा, मै ये सब लिखते लिखते रो रहा हूँ पर मुस्कुरा भी रहा हूँ तुम्हे महसूस करके, आज ये एहसास होने लगा है कि कोई मेरा नही हो सकता, या शायद मै किसी के लायक नही, 
फिर भी मै चाहूंगा कि  राह में यूँ ही चलते चलते हम एक दिन टकराये, और मै तुम्हारे कंधे पर  सर रख खूब  रोऊँ, और तुमसे पूछूं कि तुम्हे इतना यकीन मुझपे कैसे है कि तुम्हे बिना महसूस किये रह सकता हूँ मै, जबकि मुझे हर वक़्त ये लगता है  कि  जब तुम रास्ते भटक जाती होगी तो घर तक कौन ले जाता होगा, मुझे नही पता तुम मुझे अब पढ़ती भी हो या नही, झांकती भी हो या नहीं, पर पूरा यकीन है कि तुम्हारी याद में लिखी हर एक पंक्ति, हर एक शब्द तुम्हे पढ़ाऊंगा एक दिन। 
मुझे पता है तुम वापस नही आओगी, पर यकीन है कि तुम एक ना एक दिन फिर से टकराओगी, मै तुम्हे ढूढ़ना चाहू तो कभी भी ढूंढ़ सकता हूँ , पर तुम्हे पाना चाहता हूँ , ढूढ़ना नही।  आज सालो बाद इतना कुछ लिखने का साहस कर पाया हूँ, हर रोज कलम उठाता था, पर तुमपे कुछ लिखने  के लिए शब्द ढिगने पड़ जाते थे , आज चूँकि अपने बारे में लिख रहा हूँ इसलिए इतना कुछ लिख लिया, तुम मुझसे लाख गुनी अच्छी हो, देखो तो पूरी किताब लिख डाली , अब कुछ नही लिखना, हो सके तो पढ़ लेना ये सब कुछ,  बताने की जरुरत नही, एहसास हो जायेगा मुझे अगर तुम्हारी आँखे यहाँ से होकर गुजारी तो ,
तुम इसलिए गयी थी ना  कि  तुम्हारे होते हुए मै , मै  नही बन पा रहा हूँ, पूरी दुनिया से मै  कही खो ना  जाऊं , इसलिए मेरी जिंदगी से तुम खो गयी, देखो ना  तुम्हार्रे बिना मै  अब भी तो मै  नहीं, हा अब तुम्हारे सहारे की जरुरत कम  हो गयी है, तुम्हारी यादों ने वो जिम्मा ले रखा है, और बखूबी जिम्मेदारी निभा भी रहा है, पर यादो को तो तुम जानती हो ना , बड़े बेवफा होते हैं, कही किसी काम में उलझ जाऊ तो साथ छोड़  देते हैं, तुम होती तो कभी साथ ना  छोड़ती, छोडो अब कुछ नही लिखूंगा, तुम खुद समझ लेना अब !! 

सुनो अब भी वही छोटी बच्ची ही तो हो ना तुम ?

"एक नायक अपनी नायिका के लिए "

Sunday, 8 November 2015

बिहार चुनाव की समीक्षा

                                    लालटेन के तेल ने ऐसा तीर चलाया है,
                              हाथ मिला एक दूजे से कीचड़  में कमल घुसाया है 
आज लालू ने सिद्ध कर दिया कि  उनसे बड़ा राजनीतिज्ञ कोई नहीं है, हासिये पर पड़े होने के बाद एक बार फिर  किंग मेकर बन जाना ये उनकी सूझ बुझ और राजनीतिक समझ को दर्शाता है , समीकरण और कारण जो भी हैं पर लालू ने जो  लामबंदी की उसका अच्छा परिणाम आज मिला, साथ में नितीश की साफ सुथरी छवि और उनके द्वारा किया गया काम. कांग्रेस में जो थोड़ी बहुत जान आई उसका श्रेया बिना किसी संदेह राहुल को जाना चाहिए 
पर इन सबका ये मतलब नहीं की अमित शाह की रणनीति में अब वो धार नही, ये उनकी रणनीति ही थी कि उनको पहले और दूसरे चरण के चुनाव के बाद ही पता चल गया था की वो कही ना कही पीछे  हो रहे हैं और फिर उन्होंने अपना रामबाण छोड़ा, जो कि नही चल पाया, कारण लोगो ने पहले अपनी जात देखी, बाद में धर्म, मोदी का डीएनए वाले बयान का भी नितीश बाबू ने खूब फायदा उठाया, एवं भागवत जी के बयान का लालू ने, क्या है कि बिहारी भाइयो ने इन सब बातो को दिल पर ले लिया। ५३ सीट जितने के बावजूद भी एक चौथाई प्रतिशत मत पाना ये अमित शाह के राम बाण का ही नतीजा है, जो बुद्धजीवी और पत्रकार ये विश्लेषण कर रहे हैं की अमित शाह का ये दांव उल्टा पड़ गया उन्हें एक बार फिर से इस पर  विश्लेषण करना चाहिए, जहा तक मेरी समझ है ये दांव आने वाले उत्तर प्रदेश में कारगर साबित हो सकते हैं, पर अगर इस के अलावा ही चुनाव हो तो ज्यादा बेहतर है, 
दूसरी तरफ मुस्लिम मतदाताओ के पास महागठबंधन के अलावा और कोई विकल्प नही था, उनकी तथाकथित चहेती पार्टिया एक साथ थी तो  उनके वोट का विभाजन नही हो पाया और उसका नतीजा हम सब के सामने है, बाकि ज्यादा दिमाग ना लगाइये, देखिये अगले पांच साल जेपी के चेले क्या क्या करते हैं  ??

Thursday, 22 October 2015

आततायी रावण, क्या सच में ?

बचपन से लेकर अब तक हमारे बीच रावण एक आततायी के रूप में परोसा गया, पुतले फूंकते हुए बड़े हुए हैं हम, रावण की तुलना हमेशा असत्य और राम की सत्य से की गयी , पर क्या कभी हमने ये समझने की कोशिश करी क्या रावण सच में इतना बुरा था, कि  हमें हर वर्ष उसका पुतला फूंकना पड़ता है? क्या राम सच में इतने आदर्श थे कि  उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाये या राम के महिमांडन मात्र के लिए रावण को इतना बुरा बना दिया गया ?
मानता हूँ  रावण ने अपनी असीम शक्तियों का गलत प्रयोग किया , पर क्या इंद्र ने नहीं किया ? फिर इंद्र को देवता और रावण को राक्षस क्यों ? क्या इसलिए की उसने कुछ असंभव कार्यो को पूरा करने का बीड़ा उठाया था, या इसलिए कि  उसने अपनी बहन के नाक कान  काटने वाले की बीबी को कैद कर लिया था ?
आज के आधुनिक समाज की भी  बात करू तो हर इंसान अपनी घर की औरतो को लेकर बहुत ही सजग और भावुक है , रावण भी था तो उसमे क्या गलत ? उसने सीता के साथ कुछ  गलत तो नहीं किया कभी और ना  ही कोई ग्रन्थ ये सिद्ध करते हैं कि  उसके मन में भी सीता के लिए कुछ गलत था, उसने सीता को प्रस्ताव जरुर दिया था पर उस हिसाब से तो आज हिंदुस्तान का हर दूसरा इंसान रावण है फिर हम अपने उस रावण रूपी भाव को ना  जला  के रावण के पुतले को क्यों जलाते हैं ?  वो राम जिसके लिए सीता ने अपना सब कुछ त्याग दिया, उस सीता को वनवास भेजने से पहले एक भी बार नहीं सोचा, और वो रावण जिसने इतने दिनों तक सीता को अपने क्षेत्र में कैद रखा कभी स्पर्श तक नहीं किया? किसको महान मानते हैं आप ?
रावण इतना ही बुरा था तो क्यों राम  ने लक्ष्मण को उसके पास ज्ञान लेने के लिए भेजा था और राम ने जब शिव लिंग की स्थापना रामेश्वर में करायी तो पूजा रावण से क्यों करायी ? और उसी रावण ने राम को विजयी भवः  का आशीर्वाद भी दिया था जब लिंग  स्थापना के बाद राम ने उसके पैर छुए थे , उसी विद्वान रावण ने मृत्यु के समय लक्ष्मण से कहा कि  युद्ध में राम नही मै  विजयी हुआ हूँ, क्युकि मेरे जीते जी राम मेरे राज्य में प्रवेश नहीं कर पाये जबकि राम के जीते जी मै  उनके धाम बैकुंठ में प्रवेश करने  जा रहा हु, ऐसे विद्वान और सर्वज्ञानी रावण को हम कैसे सिर्फ असत्य और अधर्म की उपमा मान लेते हैं, यह एक सोचने का और बहस का विषय है ?
मुझे लगता है रावण का पुतला फूंकने से अच्छा है कि   हम अगर रावण को जिन कार्यो या गलत अफवाहों की वजह से गलत मानते हैं उन आदतो को अपने अंदर से मारे, ये दिखावे मात्र से हम राम को तो आदर्श बना सकते है पर ना  ही राम की अच्छाइयों को अपने अंदर ल सकते हैं ना  रावण की बुराइयो को मार सकते हैं, बाकी दशहरा की हार्दिक शुभकामनाये !!

Friday, 9 October 2015

बिहरवा के चुनाव

अगर बारीकी से देखे तो बिहार चुनाव अभी बीते लोकसभा चुनाव से कुछ ज्यादा अलग नही है, तब मोदी चेहरा थे अब नितीश, ताबड़तोड़  रैलियां, सभाएं, टीवी पे साक्षात्कार जितनी मोदी ने की थी , नितीश भी उतनी ही कर रहे हैं, जो PR एजेंसी मोदी के लिए काम करती थी वो अब नितीश के लिए कर रही है, इन सबके पीछे कारण  ये भी हो सकता है, अगर विभिन्नताओं की बात करे तो नितीश उतने सीट से चुनाव भी नही लड़ रहे जितना बहुमत के लिए चाहिए। 
खैर बात चुनाव में जीतने  या तैयारियों की करे तो अभी सिर्फ बात ही कर सकते  हैं यहाँ तक की अनुमान लगाना भी मुश्किल है, खुद मतदाता को नही पता की वो किसको वोट देने जा रहा  है, हालाँकि उत्तर प्रदेश और बिहार में  चुनाव के पहले वाली रात  में ही तय होता है कि  हम किसको वोट देंगे कल, कभी कभार तो लाइन में खड़े होने के बाद निर्णय लेते हैं,
जहा तक मै  महागठबंधन को देखता हु, एक बहुत ही सधा  हुआ तीर छोड़ा  है नितीश ने, मछली की आँख भेदने में ये सक्षम भी है और प्रयासरत भी , बस गाय, घर वापसी जैसे मुद्दे सर चढ़ के ना  बोलने लगे, क्यूंकि   ऐसा हुआ तो जात  पात  भूल के बात हिन्दू मुस्लमान पे आ जाएगी जैसे लोकसभा के चुनाव में हुआ था और बसपा जैसी पार्टी शून्य  पर आ गयी थी, इसलिए नितीश को यहाँ सेक्युलर वाले तीर को कमान में ही रखना होगा, वो कुछ नही बोलेंगे तब भी मुस्लमान उन्हें ही वोट देगा , वो अपने सुशासन और लालू अपने जात  वाले मुद्दे पर ही टिके  रहे तो बढ़िया होगा, बाकि ८-१० सीट उन्हें राहुल गांधी दिलवा ही देंगे। 
अब अगर बात चुनाव के महा रणनीतिकार अमित शाह की करू तो उनका कोई तोड़ नही, हर मुद्दे, हर व्यक्ति को वो लगा देंगे तो एक एक वोट के लिए, मोदी  जैसा दहाड़ने वाला वक्ता  कुछ जोशीले युवाओ में साइकिल के टायर में हवा का काम करेगा बस कुछ स्थानीय नेता उसे फुस्स  ना  करने की कोशिश करे, वैसे इन सबपे नजर रखने के लिए अमित शाह ने अपना अड्डा वही  बना रखा है। 
और अगर अब मै  दोनों विरोधियो को तराजू के पलड़े पर रख कर आँकु  तो ये साफ है कि  अभी तक दोनों बराबर हैं और अगर चुनाव के दिन तक बराबर ही रहे तो चुनाव बाद घर फुटौअल की नौबत जरूर आएगी और अगर कोई थोड़ा सा भी गड़बड़ाया तो दूसरा बाजी  मार  लेगा, जैसे लालू अभी फंस गए थे गाय  के मांस पर बोल कर  और मोदी  कुछ दिनों पहले DNA  वाला बयान   दे के, कल पहली बार लालू को पेपर पर लिखा देख कर भाषण देते हुआ सुना, हो सकता है damage  control की तैयारी हो और आगे कुछ ऐसा वैसा ना  बोल जाये उसके लिए सावधानी।
खैर मज़ा लीजिये चुनावी समर का, लड़ाई मज़ेदार है , रविश की ग्राउंड रिपोर्ट, ज़ी न्यूज़ का भाजपा प्रचार, आज तक का मोदी विरोध, रजत शर्मा का मोदी गुणगान, ये सब आपके enjoyment  में चार चाँद लगा देंगे,
बाकि जो है सो हइये  है, सही कहतानी ना  ?

Sunday, 4 October 2015

इंसान पहले

                        मेरे भी कल आंसू निकले तो  क्या मै  भी अब नापाक हूँ ,
                        रौंद  डालोगे मुझे बस इसलिए की मै  मियां अख़लाक़ हूँ

अंग्रेजो की दी हुई सौगात को  हम कब तक  ढोयेंगे, समझ नही आता , कब हम ये समझेंगे की हम इंसान पहले, हिन्दू मुस्लमान बाद में हैं , साक्षरता दर सत्तर प्रतिशत पहुंच गयी पर ऐसा लगता है  कि  सोच का प्रतिशत अभी भी शून्य  है।  हिन्दू घर वापसी में लगा हुआ है तो मुस्लमान जिहाद को पालने पोसने में , अगर यही घर वापसी पूंजा गोकुल दास मेघ जी की भी हो गयी होती तो हालत कुछ और होते, पर तब तो ये कह दिया गया की हिन्दू धर्म में जाने का रास्ता है आने का कोई रास्ता नही फिर आज काहे  की घर वापसी, ये दोहरा चरित्र क्यों ? और मुसलमानो के कौन से कुरान में लिखा गया है की जिहाद मतलब हिन्दुओ का क़त्ल ?
     अरे ये समाज के कुछ ठेकेदार हैं जो अपनी रोजी रोटी चलाने  के लिए रोज धर्म के नाम पर  मरने वाले राम सजीवन और मोहम्मद कयूम को खोज लाते  हैं , हम में से नब्बे प्रतिशत लोग इस बात को जानते भी हैं  और समझते भी हैं पर यही लोग मार  काट करने के लिए भी सबसे पहले आगे आते हैं।  
    एक बुजुर्ग को सिर्फ अफवाहों की वजह से मार  दिया गया ? अरे मारना ही है तो उनको मारो जिन्होंने भारत को गाय  का मांस निर्यात करने वाले देशो की श्रेणी में प्रथम स्थान पर ला कर खड़ा कर दिया है।  धर्म के बारे में सोचना है तो यहाँ सोचो ? कैसे भारत दूसरे स्थान से प्रथम स्थान पर आ  गया जबकि देश में उस पार्टी की सरकार है जो  गाय के मांस पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने की बात करती है ? गाय  के मांस पर पूर्ण प्रतिबन्ध होना चाहिए ये हिन्दू धर्म के लिए ही नही पुरे देश के हित  में है, पर एक हत्या के बाद दूसरी हत्या ? ये कही से भी उचित नही है , हम किसी भी पार्टी या धर्म को मानने  वाले हो ? पर हमें एक जान की कीमत का अंदाजा जरूर होना चाहिए, हमें ये जरूर सोचना चाहिए की वो किसी का बेटा  है, किसी का बाप है , हो सकता है पूरा घर उसके भरोसे जी रहा हो ? आज हमने एक अख़लाक़ को मारा तो  देखिये पुरे देश में  कही से राम सजीवन तो कही कन्हैया के मारे  जाने की खबर आ रही है , मीडिया इस मुद्दे को तब तक हवा देगी कब तक कोई बड़ा दंगा नही हो जाता क्युकि  उनकी रोजी रोटी उसी पे टिकी है, नेता इस मुद्दे पर तब तक राजनीति  करते रहेंगे  जब तक कि  कोई दूसरा अख़लाक़ नही मर जाता।  
 सारांश बस यह है की हमें अपनी सोच को उस स्तर  तक ले जाना होगा जहां  हम कोई निर्णय खुद ले सके, किसी के बहकावे ये कहे सुने में आ के ना  कुछ कहे ना  कुछ करें, क्युकि  अगला अख़लाक़ या राम सजीवन आप भी हो सकते है इसमें कोई दो राय  नही  ?? 

रातो रात दिग्विजय से खड्गे ?

                                                रातो रात दिग्विजय से खड्गे  ? एक बार फिर कांग्रेस में या यूँ कहें कि परिवार में राहुल गाँधी ...