Wednesday, 16 November 2016

पन सऊआ अदमी ( Man with 500)

हे देख रे मर्दे, बड़ा रौब झाड़त रहा ससुर पैसा के , आज लाइन में लागल बा हम्मन के संगे 4000  रूपया खातिर, सही कइलन मोदी जी ":... 

ये बात मैंने एक नही कई जगह भीड़ में सुनी, और तब मुझे लगा की मोदी ने इतना बड़ा जोखिम क्यों लिया वो भी उनके अपने वोटर कहे जाने वाले लोगो के खिलाफ, और इसमें कोई दो राय  नही कि  बनिया वोट काफी हद तक मोदी की नीतियों से खिन्न है, और इस नयी मुहीम से भी सबसे ज्यादा परेशानी राजनितिक पार्टियों और आतंकवादियो के बाद मध्यम  वर्ग के व्यापारियों को ही हुई है ,  कुछ अपना काला  धन नही छुपा रहे हैं तो कुछ व्यापार  में आयी मंदी  से दुखी हैं, अगर सुखी है तो निम्न वर्ग, क्योंकि उसे वैसे भी लाइन लगाने की आदत सी है, राशन की लाइन, केरोसिन की लाइन, मुफ्त सिम की लाइन, फलनवा लाइन, हई  लाइन हउ  लाइन , एक लाइन और लगा लेगा, और उसकी सबसे बड़ी ख़ुशी इस बात में है कि  कल तक जो करोडो रुपये का रौब झाड़ रहे  थे वो भी उसके साथ लाइन में लग के नोट बदलवा  रहे हैं और एक एक पैसे बड़ी कंजूसी से खर्च कर रहे हैं, बचपन  में एक कहावत सुनी थी, रांड ख़ुशी कब, जब सब के मरे तब, आज चरितार्थ होते हुए देख रहा हूँ, उससे थोड़ा कम  खुश निम्न मध्यम  वर्गीय है क्योंकि नमक तेल तो वो ऑनलाइन पहले से ही मंगाने  लगा था, बस पान  मसाले के पैसो के लिए लाइन में लगना  पड़  रहा है और उसे भी बर्गर, पिज़्ज़ा, हल्दीराम में लाइन में लगने का बहुत तगड़ा अनुभव है.  कुल मिला के एक बहुत बड़ा वर्ग इस फैसले के साथ है और अपना भरपूर सहयोग दे भी रहा है सारी  परेशानियों को झेलने के बावजूद भी !
 
हालाँकि इसमें कोई दो राय  नहीं कि  ये योजना कालेधन को सफ़ेद बनाने में कितना कारगर साबित होगी इसमें बहुत संशय है, एक प्रख्यात विद्धान  की बात करूँ   तो उनके अनुसार अगर ये योजना पूरी तरह से सफल होती है तो केवल 3  % कालाधन ही आ सकता है, एक सरकारी आंकड़े के अनुसार वर्ष 2000  से  2015  तक लगभग ४०० लाख करोड़ काला  धन हिंदुंस्तान में बना है, और रिजर्व बैंक के अनुसार मार्च २०१६ में 500  और १००० रुपये के कुल नोटों का कुल मूल्य १२ लाख करोड़ था , तो अगर ये मन लें की देश में उपलब्ध सरे 500  और १००० के नोट काले धन के रूप में जमा हैं जो की असंभव है तो भी केवल गत  १५ वर्षो  में जमा हुए ४०० लाख करोड़ रुपये काले धन का वह मात्र ३ %  होता है, अर्थात इस योजना के पूर्ण रूप से सफल होने पर भी केवल १या २ % काला  धन वापस आएगा !
 
अब बात करते हैं उनकी जिन्हें बहुत दर्द हो रहा है, कुछ इज़हार कर रहे हैं, कुछ विशेष सत्र बुला के अपने मन की भड़ास निकल रहे हैं , और कुछ मन ही मन गरिया रहे हैं, जहाँ तक मेरा आकलन है, इस नोट बंदी से अगर सबसे ज्यादा कमर टूटी है तो आम आदमी , बसपा, सपा जैसी भ्रष्ट दलो  की, उनका चुनावी समां मानो  रुक सा गया है, क्योंकि जितने पैसे थे सब रद्दी हो गए, उसके बाद आतंकवादियो को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, क्योंकि जितने भी पैसे अलग अलग संसाधनों से उन्होंने जुटा  रखे थे और जिन पैसो के भरोसे अगले  कुछ महीनो की योजनाए तय हुई थी वो अब विफल होती दिख रही है। 

कुल मिला के मोदी का ये मंत्र बहुत हद तक आतंकवाद और वोटो  के नोटवाद को नियंत्रित करने में कारगर साबित होगा और ये मुमकिन है कि  इस फैसले के समय का चुनाव इसी कारणवश किया गया हो, हालाँकि मोदी की उपलब्धि उनके  लिए सरदर्दी में तब्दील होने लगी है और अगले २-४ दिनों में अगर स्थिति नही सुधरी तो सांप नेवले वाली  स्थिति पैदा हो जाएगी, हालाँकि कई राजनितिक पार्टिया और करोड़पति इस स्थिति को और बिगाड़ने  की भरसक कोशिश कर भी रहे हैं और अब इस योजना के शानदार कार्यान्वयन का दायित्व नौकरशाहों  पर है , अगर वो अपना काम कर गए तो अगले कुछ दिनों में पैदा होने वाली भयावह स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है,  और नही किया तो पता ही है कि  ये हिंदुस्तान है !!

 

Friday, 21 October 2016

मुलायम खटिया ( Mulayam Khatiya)

अखिलेश को जो  मुलायम खटिया उपहार स्वरुप 2012  में  मिली थी, उसे दुबारा बुनने का वक़्त आ गया है, फर्क इतना है तब ताना  बाना  मुलायम था, अब थोड़ा कड़ा और टेढ़ा, कड़ा इसलिए क्योंकि अब सामने एक नही तीन तीन तैयार दुश्मन हैं , हालाँकि राहुल की खटिया कितना रंग लाती  है  वो कुछ दिनों में पता चल जायेगा, पर जब राहुल की खटिया को  उड़ते हुए देखा तो शहंशाह  अमर  सिंह का खुराफाती दिमाग काम आया, और सामने आ गयी चाचा भतीजे की नौटंकी और सारा मीडिया इसी चाचा भतीजे की लड़ाई दिखने में व्यस्त हो गया, और चुनाव होने तक व्यस्त रहेगा, आज हर PR एजेंसी को पता है कि  चुनाव जितना है तो बस  खबर में बने रहो, सही गलत का खंडन तो बाद में उनके बड़े नेता कर ही देंगे।  
जहाँ  तक मैं  मुलायम और मुलायम परिवार को जानता  हूँ,  उनमे लाख असमानताए होने के बावजूद भी वो घर का झगड़ा कभी सड़क पर लेकर नही आएंगे, और ऐसे सारे  झगडे चारदीवारी के अंदर नेता जी द्वारा सुलझा दिए जाते हैं, पर अब ऐसा क्यों हो रहा है? वो भी अचानक चुनावी समय में ?
जहाँ तक मेरी समझ है इन सबके पीछे अमर सिंह का गुणा  गणित काम कर रहा है, उसके पीछे एक सबसे बड़ा कारण  है सपा को गुंडों की पार्टी से नवाजा  जाना, और ये पाप सिर्फ और सिर्फ अखिलेश धो सकते हैं, क्युकि  अभी तक उनपे ऐसे कोई आरोप नही लगे हैं, एक मासूम, पिता का आज्ञाकारी युवा की छवि बनी  हुई है लोगो में, लेकिन ये छवि काजल की कोठरी  में रह के धूमिल हो रही थी, उसको चमकाने का एक ही रास्ता है, सयाने को कोठरी  से बागी बना दो, एक बेचारे वाली छवि जनता के सामने रख दो, और साथ साथ ये भी दिखाने  की कोशिश की जा रही है कि  अखिलेश की अलग सेना है, और अगली सरकार  में यही साफ सुथरी सेना रहेगी , वो अपने मकसद में काफी हद तक कामयाब भी रहे हैं, बस थोड़ी सी ग़लतफ़हमी उनके कार्यकर्ताओ में जरूर फैली है, और अगर वो ग़लतफ़हमी दूर नही की गयी तो खामियाजा भी भुगतना पड़  सकता है।  
जहाँ तक मैं  अनुभव कर रहा हूँ अभी भी सपा लड़ाई में सबसे आगे है, और अगर बीजेपी बस लोगो को अंदर बहार करने में ही लगी रही तो ये आगे रहेंगे भी, क्योंकि कुछ अच्छे काम अखिलेश ने किये तो जरूर हैं और लोग उस बात को मानते भी हैं, बस सबकी शिकायत गुंडाराज को लेकर थी, उसे भी ये नौटंकी कर  के दूर कर दिया गया है, बीजेपी के सबसे बड़ा मुदा सपा ने उससे छीन लिया है, बीजेपी जिस गुंडाराज के बुते चुनाव जितने का सपने देख रही थी  उसे अमर सिंह के तंत्र मंत्र ने तार तार कर दिया है , और बाकि रही सही कसर  श्रीकांत शर्मा जैसे लोग पूरी कर देंगे।  बाकि जो है सो हइये  है !!

Friday, 5 August 2016

उत्तम प्रदेश का शाह मत

माननीय अमित शाह जी,
मैं  आज तक कभी आपसे नही मिला, बहुत कुछ ना  ही जानता  हूँ, ना  बहुत कुछ पढ़ा है आपके बारे में, पर इतना जरूर जानता  हूँ  कि कूट और  राजनीति में आपका कोई सानी  नहीं है , लालू यादव के बाद अगर मैं  किसी को खाटी  राजनेता मानता  हूँ तो आपको, और ये आपने  पिछले कुछ सालो में सिद्ध  भी कर दिया है, राजनितिक रूप से कोई कितना भी विरोध आपका करे पर वो आपके कुटिलता को नकार नही सकता, कश्मीर से लेकर असम  तक जो दिया आपने जलाया  है वो काबिले गौर और तारीफ है, अगर मैं  बिहार और दिल्ली के  दर्द  को शामिल ना  करूँ तो गिनवाने के लिए ढेर सारी  उपलब्धियां हैं , और यही वजह है कि आज तक भाजपा का कोई नेता उंगली नहीं उठा पा  रहा, पर आने वाला साल और उसमे होने वाले चुनाव आपके लिए सबसे अहम् है।  
         अगर मैं  आगामी  चुनाव की बात करू तो सबसे अहम् है अक्लेश  के उत्तम प्रदेश का चुनाव , उत्तर प्रदेश की लड़ाई जितनी  उलझी है उतनी ही सुलझी हुई भी, लड़ाई  आमने सामने की भी है तो भीतर घात  की भी, आमने सामने की लड़ाई को आप जीत  भी लेंगे पर  भीतरघात  का अंदाजा  लगाना बड़ा मुश्किल है, वो भी ऐसे प्रदेश में जहा हर इंसान अपने आप को राजनीतिज्ञ ही समझता है, जिस सैलाब ने विरोधियो को किनारे तक का नही छोड़ा था लोक सभा चुनाव में, वो अब आने से रहा, क्योंकि २ साल  में बहुत कुछ बदल चुका  है, लोग खिसियाये हुए हैं बीजेपी से , क्योंकि यूपी  बिहार के गरीब तबके के युवाओ ने सिर्फ अपना पाला  इसलिए बदला था कि  उन्हें उनके घर में रोजगार मिलेगा, जो कि  कही से भी होता हुआ नही दिखता , हालाँकि इसमें बहुत समय लगता है पर जिस तरह से सपने दिखाए गए थे, उन सपनो को जनता भूल नही पा  रही है।
अगर जमीनी स्तर  की बात करूँ तो एक उज्ज्वला  योजना को छोड़कर कोई ऐसी योजना नही दिखती जो सीधे गरीब के पेट और दिल दोनों को छुए। और वो उज्ज्वला  भी कहा तक प्रज्वलित हुई है या  हो रही है कहना मुश्किल है।  तब एक हिंदुत्व का चेहरा था और साथ में विकास का वादा भी, अब ना  ही आपके पास कोई चेहरा है ना  ही भरोसा दिलाने वाला वादा।  और शायद इसी वजह से अभी तक किसी नाम तक आप लोग पहुचे नही हैं , ले दे के एक योगी आदित्यनाथ का नाम बार बार घूमता है जिनकी स्वीकार्यता पूर्वांचल में बहुत है पर पश्चिम में उतनी ही कम  और उनके अंदरूनी विरोधी भी बहुत हैं  पश्चिम में।  कोई आयातित नेता तो बिल्कुल  नहीं चलेगा ना  ही आप उसको चलाने  की कोशिश करेंगे क्योंकि दूध का जल छाछ भी फूंक  फूंक  कर पीता  है।   
      मुझे पता नही पर ऐसा लगता है कि  मोदी जी या आपने  राजनाथ सिंह को पटाने की कोशिश करी  होगी, वो मान  भी जाते पर केंद्र की राजनीति  से दूर होने का भय उनको हमेशा सताता  है, हालाँकि अगर वो मान  जाते हैं तो भाजपा के लिए एक बेहतर विकल्प होगा, क्योंकि उनसे बड़ा घाघ नेता उत्तर प्रदेश में कोई है तो सिर्फ मुलायम सिंह यादव, पर राजनाथ जी का भाग्य उन्हें मुलायम से आगे जरूर रखेगा हर कदम पर।  ऐसा भी हो सकता है की वो मान  गए हो और उसी के क्रियान्वयन स्वरुप उन्होंने  पाकिस्तान में दहाड़ता हुआ भाषण दिया और सही समय आने पर उनकी ताजपोशी कर दी जाये, और उनके आने से भाजपा के जीतने  की संभावनाएं प्रबल होंगी और अगर वो किन्ही कारन वश नही आते हैं तो आपसे एक गुजारिश करूँगा कि  किसी और का नाम  आगे करने की बजाय आप अमित भाई शाह यानि खुद को मुख्य मंत्री का प्रत्याशी घोषित करियेगा बिना दाये  बाये सोचे , मुझे पता है कि  संगठन की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है आपके पास पर उत्तर प्रदेश चला गया तो धीरे धीरे संगठन भी कुतरने लगेगा और 2019  की पटकथा कोई और ही लिखेगा।  यहाँ के छुटपुन्जिये नेता बिहार के नेताओ की तरह हैं, उनको काम नही आका  जा सकता, और उनपर नियंत्रण भी कोई छोटा मोटा नेता नहीं रख पायेगा, उसके लिए राजनाथ जी जैसा महीन या आप जैसा बीहड़ नेता चहिये, ये मेरी सलाह और राजनितिक अनुभव है, बाकि आप को कोई क्या बता पायेगा भला ?
और अगर किसी कारण  वश आपने बिना नाम या किसी और नाम के चुनाव लड़ा तो कम  से कम  मुझे जीत  दूर दिखाई देती है , हालाँकि जिंदगी के हर पहलु में आप मुझसे बीस  हैं पर कभी कभार 18, 19  की गिनतियों पर भी दांव लगा देना चहिये, वो भी तब जब कोई और दांव आपके अगले कई साल लिखने वाला हो , बाकि जो है सो हइये  है .???? 

Monday, 9 May 2016

मम्मी डे (Mother's Day)

कल फेसबुक  पर  मम्मियों  को प्यार करने वालो का ताता  लगा हुआ था, जिनका  इस दुनिया में आना उस माँ ने लिखा , लोग उस माँ पर तरह तरह की बाते  लिख रहे थे, एक होड़  सी मच जाती है लोगो में ऐसे दिनों।
  जो  अपनी माँ को  दो वर्ष पहले ही वृद्धाआश्रम छोड़ आये थे उनका भी प्यार फुट फुट कर छलक रहा था, मुझे गुरेज उनके प्यार से नहीं इस दिखावे से है, आखिर किस बात का दिखावा ? क्या दस बीस  दोस्त माँ के प्यार वाली पोस्ट को लाइक  कर देंगे तो साबित होगा हमारा प्यार ? क्या हमारा पूरा प्यार बस एक दिन के लिए है, पश्चिमी  देशो में इस तरह के त्यौहार समझ में आते हैं जहां पुरे साल में ऐसे ही एक दो मौकों पर बेटे बेटियाँ  अपने माँ बाप से मिलते हैं, पर क्या हिंदुस्तान में इस एक विशेष दिन की कोई उपयोगिता है ? जहां मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः का पाठ  पढ़ाया जाता है और अब भी ज्यादातर लोगो द्वारा अनुसरित भी होता है, जहाँ  अब भी अधिकतर घरों में माँ बाप ही घर के बड़े हैं और बिना उनके घर, घर नहीं लगता। 
      पश्चिमी देशो से हम सीख  रहे हैं, ये अच्छी बात है, लेकिन क्या सीख रहे हैं ये देखने वाली बात है, हमने छोटे कपडे पहनना सीख लिया लेकिन हमने उन्हें देखने की मानसिकता अभी भी नहीं बदली, अभी भी हमारी निगाहे राह चलती लड़की को ऐसे ताड़ती हैं जैसे उस लड़की या महिला ने गुनाह कर दिया  हो सड़क पर निकल कर ,   हमने कभी पश्चिमी देशो के  समय प्रबंधन को  सीखने  की कोशिश नहीं करी, हम आज भी नौ बजे की मीटिंग में साढ़े नौ तक बमुश्किल पहुंचते  हैं , पर मैंने किसी अमेरिकन या अंग्रेज को एक मिनट की देरी से भी पहुंचते नहीं देखा। 
            ये अच्छी बात है कि  हमने मम्मी डे, पापा डे मनाना  सीख लिया, लेकिन हमने अपने प्यार का दायरा इतना घटा दिया है कि  वो इन्ही एक दो दिनों तक सिमट कर रह गया है, दिन ब  दिन वृद्धाश्रमों की बढ़ती तादाद इस बात की पुष्टि भी करती है, हमारे विचार इतने खुले हो गए हैं की माँ बाप हमरे घरों में बोझ बन गए हैं, हम बागान फिल्म देखते देखते आंसू तो बहाते  हैं पर अगले ही क्षण अपने घर में अपने बुजुर्गो से वैसा ही बर्ताव करते हैं।  अपनी भावनाओ को प्रकट करना अच्छी बात है, परन्तु बेमन की भावना भी बस दिखाने  मात्र के लिए होती है, हम दिखावटी के किस घुड़दौड़ में दौड़ रहे हैं, ये शायद हमें भी नहीं पता, शाम तक मुझे भी लगने लगा था कि  कही मैंने गुनाह तो नहीं किया अपनी माँ की फोटो फेसबुक पे ना  लगा के ?
हिंदुस्तान की पहचान यहाँ के रिश्तों की प्रगाढ़ता और संस्कारो के रूप में ही होती है, हम तो वैलेंटाइन भी पुरे दो महीने बसंत ऋतू के रूप में मनाते  हैं , फिर ये तो हमारे माँ बाप हैं, इनकी तस्वीर साल के ३६५ दिन भी हम अपने दिलोदिमाग में ले के चले तो भी हमें कम लगता है,
          मेरा बस इतना कहना है कि  हम दिखावा भी करे तो उसका जिसका अस्तित्व हो, सिर्फ दिखाने  के लिए न करे,  जिस दिन इस हिंदुस्तान में एक भी वृद्धाआश्रम नहीं रहेगा, उस दिन मैं  पुरे शान से mothers  डे , fathers  डे मनाऊंगा, पर उससे पहले मेरी हिम्मत नहीं .... 

Tuesday, 9 February 2016

नमस्कार मै रविश कुमार

नमस्कार मै  रविश कुमार , सालो पहले जब दिल्ली आया, करते कराते  सात हज़ार की नौकरी लगी, और  टीवी ट्यूनर के सहारे टीवी का शौक पूरा किया तो ये आवाज मेरे कानो में सबसे पहले पड़ी, फिर लगाव सा हो गया इस आवाज से, या यूँ कहु उस अंदाज से, बचपन में जो जूनून रविवार को नौ बजे दिन का था  वही फितूर अब हर रात  नौ बजे का हो गया था, मैंने गोविन्दाचार्य के अलावा किसी व्यक्ति विशेष के बारे में ना  कभी कुछ लिखा और ना  ही इतना सम्मोहित हुआ, पर उनसे भी पहले शायद मै  इस आवाज से सम्मोहित हुआ, बहुत सारे  एंकर  को देखा रविश की तरह हुकारी  भरते हुए, पर वो कानो को परेशान करने वाले ज्यादा लगे, पर जब वही  हुंकारी थोड़े बिहारी अंदाज में रविश लगाते हैं तो मज़ा आता है सुनने में। 
बहुत दिनों से सोच रहा था कुछ लिखू पर नही लिख रहा था, पर कल जब पूरी रात  रविश के साथ पत्रकारिता कि  तो आज रोक नही पाया लिखने से,  सुबह टहलते हुए मिलने से लेकर उनके घर पर ठेठ अंदाज में नहाने, खाने और झुग्गी झोपड़ी में घुस कर सवाल पूछने का सफर तय किया मैंने, बीच में फार्च्यूनर गाड़ी में सफर भी किया, और गप्पे भी लड़ाई, देश दुनिया की बाते  भी करी, कुछ दिनों पहले रविश से फोन पर बात हुयी थी,  उन्होंने कहा था देश तो राहुल और मोदी संभल ही लेंगे, हमारी क्या जरुरत है, उस मुद्दे पर भी बात हुयी,  मेरे ख्याल से ४-५ घंटो का सपना था,  कुल मिला के पुरे दिन एक दोस्त के साथ सफर तय किया, हालाँकि सारे  सपने सुबह के अलार्म के साथ खाक हो गए, और उस सपने का अंत जो मै  अब तक सिर्फ लड़कियों के लिए ही देखा करता था। 

मै  कभी रविश से मिला नही पर उनकी बातो  में खीझ से पता चलता है कि  कोई सपनो का भारत है इस इंसान के मन में, जिसके लिए वो कोशिश करता है, कभी टूट भी जाता है पर फिर वो सपने उसे उठ खड़े होने को मजबूर कर देते हैं , जब वो बड़े बड़े सेमिनार में बिहार के कुछ ठेठ शब्द का इस्तेमाल बड़े शान से करता है तो लगता है की ये कोई लिखी पढ़ी बात  नही बल्कि दिल की बाते  बोल रहा है, क्यूंकि इंसान भावुकता में ही अपने आधार से जुड़ता है. शायद यही देशी और शुद्ध अंदाज ही हम जैसे लोगो को और करीब लाता  है रविश के , हालाँकि ऐसी कई सारी  बाते और भी हैं, अब भला सोचिये कोई बड़ा पत्रकार भला ये सोच सकता है कि  ट्रेन  में बिहार, यु पी के लड़के काला  चश्मा , टी शर्ट पहन के क्यों  घूमते हैं  पुरी  ट्रेन  में, क्यूँ  नीरी  गर्मी  में  भी  ऑटो  में दोनों तरफ के परदे लगे हुए हैं,  ये रविश का अनुभव और दूरदर्शिता ही तो है जो जी  बी रोड के आसपास रहने वाले लोगो के बारे में सोचता है,
रविश से मेरा लगाव कुछ बातो से भी है जैसे ये लाइन शौके दीदार अगर है तो नजर पैदा कर, बचपन में कक्षा चार या पांच में हिंदी में पढ़ी  थी ये लाइन और गाहे बगाहे लोगो से बातचीत में चिपकाता रहता हु इसे ,और रविश की भी ये पसंदीदा लाइन है, हालाँकि मेरा और उनका कोई मुकाबला नही पर मुकाबले नही तो क्या मुलाकात से भी गए ??
खैर आगे कुछ समझ नही आ रहा कि  क्या लिखू तो बाकि जो है सो हइये  है !!!!

Thursday, 7 January 2016

मेरी नायिका

                                                             
       मै तो शब्दों की तलाश में ही भटक रहा था जालिम, और   तुम  किताबो का जखीरा ले आये,
आज पता चला कि तुम्हारा एक सपना पूरा हुआ, दुःख हुआ कि सपने सजोने का कारण तो बना पर पूरा करने में  साथ ना दे पाया, कारण कुछ भी रहे हो,  तुम दूर गयी या मै, अगर मै  अभी हुए   सुख और तुम्हारे जाने के बाद हुए दुःख दोनों को आँकू तो अभी हुए सुख से  खुश ज्यादा हूँ।   आज यूँ ही दिल उदास था,  शायद वो नायिका अपने नायक से कुछ कहना चाह रही हो पर कह तो नही सकती ना, ना कहने की कसम जो खा रखी है, उस उदासी में तुम्हे ढूढ़ते ढूढ़ते तुम्हारे सपनो की उड़ान तक पहुंच गया, जी किया अभी के अभी पूरी किताब बाच लूँ , पर ना पढ़ने का फैसला किया , हा तुम्हारा कवर नोट रोज पढूंगा, मै ये सब लिखते लिखते रो रहा हूँ पर मुस्कुरा भी रहा हूँ तुम्हे महसूस करके, आज ये एहसास होने लगा है कि कोई मेरा नही हो सकता, या शायद मै किसी के लायक नही, 
फिर भी मै चाहूंगा कि  राह में यूँ ही चलते चलते हम एक दिन टकराये, और मै तुम्हारे कंधे पर  सर रख खूब  रोऊँ, और तुमसे पूछूं कि तुम्हे इतना यकीन मुझपे कैसे है कि तुम्हे बिना महसूस किये रह सकता हूँ मै, जबकि मुझे हर वक़्त ये लगता है  कि  जब तुम रास्ते भटक जाती होगी तो घर तक कौन ले जाता होगा, मुझे नही पता तुम मुझे अब पढ़ती भी हो या नही, झांकती भी हो या नहीं, पर पूरा यकीन है कि तुम्हारी याद में लिखी हर एक पंक्ति, हर एक शब्द तुम्हे पढ़ाऊंगा एक दिन। 
मुझे पता है तुम वापस नही आओगी, पर यकीन है कि तुम एक ना एक दिन फिर से टकराओगी, मै तुम्हे ढूढ़ना चाहू तो कभी भी ढूंढ़ सकता हूँ , पर तुम्हे पाना चाहता हूँ , ढूढ़ना नही।  आज सालो बाद इतना कुछ लिखने का साहस कर पाया हूँ, हर रोज कलम उठाता था, पर तुमपे कुछ लिखने  के लिए शब्द ढिगने पड़ जाते थे , आज चूँकि अपने बारे में लिख रहा हूँ इसलिए इतना कुछ लिख लिया, तुम मुझसे लाख गुनी अच्छी हो, देखो तो पूरी किताब लिख डाली , अब कुछ नही लिखना, हो सके तो पढ़ लेना ये सब कुछ,  बताने की जरुरत नही, एहसास हो जायेगा मुझे अगर तुम्हारी आँखे यहाँ से होकर गुजारी तो ,
तुम इसलिए गयी थी ना  कि  तुम्हारे होते हुए मै , मै  नही बन पा रहा हूँ, पूरी दुनिया से मै  कही खो ना  जाऊं , इसलिए मेरी जिंदगी से तुम खो गयी, देखो ना  तुम्हार्रे बिना मै  अब भी तो मै  नहीं, हा अब तुम्हारे सहारे की जरुरत कम  हो गयी है, तुम्हारी यादों ने वो जिम्मा ले रखा है, और बखूबी जिम्मेदारी निभा भी रहा है, पर यादो को तो तुम जानती हो ना , बड़े बेवफा होते हैं, कही किसी काम में उलझ जाऊ तो साथ छोड़  देते हैं, तुम होती तो कभी साथ ना  छोड़ती, छोडो अब कुछ नही लिखूंगा, तुम खुद समझ लेना अब !! 

सुनो अब भी वही छोटी बच्ची ही तो हो ना तुम ?

"एक नायक अपनी नायिका के लिए "

रातो रात दिग्विजय से खड्गे ?

                                                रातो रात दिग्विजय से खड्गे  ? एक बार फिर कांग्रेस में या यूँ कहें कि परिवार में राहुल गाँधी ...