Tuesday, 17 September 2019

सामाजिक कोहराम

                                                              ! सामाजिक कोहराम !

               कई नव अंकुरित फेमिनिस्ट के विचार पढ़ रहा था, कोई चिट्ठी लिख के तो कोई निवेदन पत्र लिख कर अपने आस पास के रिश्तेदारों, चाचाओ, मामा को कोस रहा था तो कोई ताक झाँक करने वाले सामाजिक मित्रों को.. आज या यूँ कहूँ कि अक्सर सड़कों पर, मेट्रो में, बसों में ऐसे अनेक सामाजिक जगहों पर कुछ ऐसा देखता हूँ कि समाज की याद आती है, उस समाज की जिसकी संरचना किसी विशेष उद्देश्य से हुई नहीं थी अपितु विशेष उद्देश्यों मे परिवर्तित हो गयी थी.. आज की घटना कुछ विशेष है इसलिए पहले उसे कहने के बाद ही विषयांतर (विषयांतर इसलिए क्यूँकि, आधुनिक युग में ऐसे विषय की बात करना विषयांतर होने जैसा ही है ) होना चाहूँगा, आज दिल्ली के एक नामचीन जगह पर बैठा हुआ था, सामने एक ठेले वाला गाने की धुन में मस्त चिप्स, ठंडाई, सिगेरट, गुटखा  और बिसलेरी की दुकान सजाये खड़ा था, एक बच्ची आई, उम्र लगभग 12 या 13 साल रही होगी, ठेले वाले भैया से  सिगेरट की वैरायटी छाँटते  हुए बोली, लाइटर रखा करो, माचिस से जलाने  में मज़ा नहीं आता, ठीक है मैडम कहते हुए उस भैया ने सर हिलाया और पैसे अपने तिजोरी में डाल  लिया , सिगेरट की डिबिया लेकर ज्यों  ही वह बच्ची मुड़ी, उसी की हमउम्र ३-४ लड़कियों ने उसे घेर लिया और अपना अपना सिगेरट छीनने के बाद वही पास में सड़क के किनारे बैठ के सिगेरट में धुएँ  से छल्ला उड़ाने लगी, मेरे आसपास जितने लोग बैठे थे सब अफसोस जताने के अलावा और कुछ नहीं कर पाने की स्थिति में थे, पता है क्यूँ ? क्यूँकि उन बच्चियों पर उनका कोई हक़ नहीं है, क्यूँकि "मुझे मेरी प्राइवेसी  चाहिए" के ज़माने में हम माँ बाप, चाचा चाची , पड़ोस के अंकल जैसे  रिश्तों  को खूँटी पर टाँग आये हैं , हमें अब किसी बड़े की बात उसके टाँग अड़ाने के अलावा और कुछ नहीं लगती !
              खैर ये तो बच्चियाँ थीं, हर कुछ जल्दी जानने के बाद उसे अनुभव करने के शौक से ग्रसित हैं पर सामाजिक रिश्तो का ख़त्म होना सिर्फ ऐसी घटनाओ को बढ़ावा नहीं दे रहा अपितु हमारे घर के बेडरूम  से लेकर हमारे जीवन के मूल्यों पर भी चोट कर रहा है, पति पत्नी की लड़ाई को पहले सास ससुर या चाचा सास ससुर अपनी मध्यस्थता से छोटी छोटी लड़ाइयों को वही ख़त्म करा पाने की हैसियत में थे, पर प्राइवेसी चाहिए वाली जिंदगी के झगडे अब  बेडरूम से शुरू होकर सीधे कोर्ट रूम में ही ख़त्म हो रहे हैं ?
                 एक लड़की या महिला जिसे पूरा गांव और आसपास के कुछ गांव के लोग बहन, चाची , दादी के रिश्ते से जानते थे और मानते थे आज उन्ही रिश्तो के अभाव में शहर के अपनी ही गली में रहने वाले किसी लड़के या आदमी से बलात्कार का शिकार हो जाती है, घर का कोई लड़का जब कोई गलत काम करता था तो उसे केवल अपने माँ बाप की नहीं चाचा, मामा ,अंकल सबसे डर लगता था, पर अब बाप की  भी क्या मजाल जो ऊँची आवाज में बेटे से बात कर ले ,
                    अगर आपको ये लगता है कि हमारी पर्सनल लाइफ में कोई अंकल, कोई आदमी  क्यूँ दखल करे जो हमें ना खाने को देता है ना पीने को, तो क्या आप ये सोचते हैं कि हमारे भी माँ बाप किसी के अंकल हैं वो भी दखल देते ही होंगे,इसलिए नहीं कि उन्हें किसी के जीवन में चरस बोना है, इसलिए कि कहीं ना कहीं उस पडोसी के लड़के या लड़की से आत्मीयता है, सोचिये आज ये जो दिन दोपहरी शहर के सबसे व्यस्त इलाके में लैला मजनू का जो ये अश्लील खेल हर रोज खेला जाता है, क्या वह खेल किसी चाचा, मां या जानने वाले के सामने खेला जा सकता है क्या? सोचना आपको है आपको अपनी प्राइवेसी चाहिए या वो समाज जहाँ हर एक शख्स एक दूसरे के दुःख सुख में खड़ा है, वो समाज चाहिए जो आपके किसी अपने के चले जाने पर आपके साथ महीनो तक ढृढ़ता से खड़ा है या वह समाज जो चिता जलने तक का इंतज़ार नहीं कर पाता और पानी प्राइवेसी वाली जिंदगी में गुम होने चला जाता है, सोचिएगा जरूर। 

2 comments:

रातो रात दिग्विजय से खड्गे ?

                                                रातो रात दिग्विजय से खड्गे  ? एक बार फिर कांग्रेस में या यूँ कहें कि परिवार में राहुल गाँधी ...