Monday, 23 March 2020

कोरोना : हम कितने तैयार

                                                  ! कोरोना : हम कितने तैयार !
तमाम विशेषज्ञो और मीडिया चैनल्स की माने तो वैज्ञानिक रूप से हम कोरोना को कल आधे घंटे ताली और थाली बजाकर भगा चुके हैं, चूँकि अंतर्राष्ट्रीय विमानों का आवागमन सरकार द्वारा स्थगित कर दिया गया है इसलिए मुझे थोड़ी आशंका है कि कोरोना भाग गया होगा, हाँ एयरपोर्ट तक जरूर पँहुच गया होगा अब चूँकि अगले  कुछ दिनों तक अंतर्राष्ट्रीय विमान सेवा में नहीं हैं तो क्या पता उसका मूड बदले और वो वापस आ जाये, तो वापस आने की स्थिति में हमारी क्या तैयारियाँ हैं यह जानना जरुरी है ?
            
             मै यहाँ यह बात नहीं करूँगा कि अगर आप दिल्ली एनसीआर में रह रहे हैं और आपको आशंका हुई कि आप कोरोना से संक्रमित हैं तो आप किस अस्पताल में चेक अप कराने जायेंगे?  और देश में इस तरह की बीमारी से लड़ने के लिए क्या संसाधन हैं ? मै सिर्फ ये बताना चाहूंगा कि क्या आपको पता है कि देश में इस तरह  की आपदा से लड़ने के लिए हमारा अपना कोई कानून नहीं है ?
           हमारे पास कानून के नाम पर अंग्रेजो द्वारा बनाया गया Epidemic Diseases Act, 1897 है, (हालाँकि पूरा संविधान ही उनके द्वारा बनाया गया है फिर भी समय दर समय इसमें परिवर्तन होते रहे हैं ) जिसे अब राज्य और केंद्र सरकार ने invoke किया है या उस कानून के द्वारा क़ानूनी स्थिति सुधारने की कोशिश कर  रही है, यह कानून  तब के बॉम्बे प्रेसीडेंसी द्वारा 1896 में तब बना था जब देश प्लेग जैसी महामारी से जूझ रहा था, 
     इस कानून की कुछ अच्छी बाते  :
           यही  कानून राज्य और केंद्र सरकारों को  शक्ति देता है जिसके द्वारा वह किसी भी क्षेत्र को अति प्रभावित क्षेत्र घोषित कर जरुरी कार्यवाही कर सकते हैं, किसी भी नागरिक, आगंतुक का इंस्पेक्शन कर सकते हैं , इसी कानून के  सेक्शन 2A के आधार पर केंद्र सरकार  किसी भी अंतर्राष्ट्रीय विमान, पनडुब्बी की तलाशी ले सकता है रेगुलेशन सेट कर सकता है, और सेक्शन 2 यही अधिकार राज्य सरकारों को  भी देता है, सेक्शन 2   सरकारों को यह भी अधिकार देता है कि वह इस आपदा से लड़ने के लिए कोई भी तात्कालिक कानून बना सकते हैं और उसी कानून का प्रयोग करते हुए दिल्ली, उत्तराखंड, पंजाब, महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने अपने अपने राज्यों में लॉक डाउन की घोषणा की है, सेक्शन 3 के अनुसार जो व्यक्ति इन परिस्थितियों में राज्य या केंद्र सरकार द्वारा बनाये गए नियमो का पालन नहीं कर रहा है उस पर   IPC की  धारा 188  के अंतर्गत कार्यवाही की जा सकती है  (हालाँकि IPC 188 के अंतर्गत अधिकतम सजा सिर्फ 6 महीने की है या 1000 का जुर्माना, या दोनों सजा हो सकती है, इसलिए इस धारा  के अंतर्गत किसी की तत्काल गिरफ़्तारी संभव ही नहीं है ). 
          सेक्शन 4 के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति पर कोई क़ानूनी कार्यवाही नहीं की जाएगी यदि उसने Good Faith में कोई ऐसा काम किया है जिससे इस आपदा से लड़ने में मदद मिल रही हो।  

कानून की कमियाँ :
                यह कानून सिर्फ और सिर्फ रेगुलेटरी की बात करता है जबकि स्वास्थ्य सेवाओं पर बात नहीं करता, 
लगभग 125 साल पुराना कानून हो सकता है तब की परिस्थियों को टैकल करने में सक्षम रहा हो पर क्या आज भी वही कानून सक्षम है, यह कानून तब बना था जब केवल लोगो पर काबू कैसे पाया जाय इस बात की प्राथमिकता ज्यादा थी, और लोगो को ठीक कैसे किया जाय इस बात की नगण्यता।  
               हालाँकि 2009 में तब की सरकार  इस कानून को रिप्लेस करने के लिए नेशनल हेल्थ बिल लेकर आयी थी जिस बिल की खास बात यह थी कि स्वास्थ्य को फंडामेंटल ह्यूमन राइट बनाने का निर्णय था, उस बिल के अनुसार देश का  हर नागरिक बेहतर से बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पाने का अधिकारी होगा और इस कानून के द्वारा लोगो के इस अधिकार को क़ानूनी रूप देने का निर्णय लिया  गया था जिससे कोई भी सरकार उससे मुँह न मोड़ पाये, पर देश में ऐसे कानूनों के पास होने के लिए अभी लम्बी लड़ाई लड़नी होगी, क्यूँकि जब हमारा काम थाली और ताली बजाकर चल जा रहा है तो फिर हमें बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की जरुरत ही क्या है ?


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