नमस्कार मै रविश कुमार , सालो पहले जब दिल्ली आया, करते कराते सात हज़ार की नौकरी लगी, और टीवी ट्यूनर के सहारे टीवी का शौक पूरा किया तो ये आवाज मेरे कानो में सबसे पहले पड़ी, फिर लगाव सा हो गया इस आवाज से, या यूँ कहु उस अंदाज से, बचपन में जो जूनून रविवार को नौ बजे दिन का था वही फितूर अब हर रात नौ बजे का हो गया था, मैंने गोविन्दाचार्य के अलावा किसी व्यक्ति विशेष के बारे में ना कभी कुछ लिखा और ना ही इतना सम्मोहित हुआ, पर उनसे भी पहले शायद मै इस आवाज से सम्मोहित हुआ, बहुत सारे एंकर को देखा रविश की तरह हुकारी भरते हुए, पर वो कानो को परेशान करने वाले ज्यादा लगे, पर जब वही हुंकारी थोड़े बिहारी अंदाज में रविश लगाते हैं तो मज़ा आता है सुनने में।
बहुत दिनों से सोच रहा था कुछ लिखू पर नही लिख रहा था, पर कल जब पूरी रात रविश के साथ पत्रकारिता कि तो आज रोक नही पाया लिखने से, सुबह टहलते हुए मिलने से लेकर उनके घर पर ठेठ अंदाज में नहाने, खाने और झुग्गी झोपड़ी में घुस कर सवाल पूछने का सफर तय किया मैंने, बीच में फार्च्यूनर गाड़ी में सफर भी किया, और गप्पे भी लड़ाई, देश दुनिया की बाते भी करी, कुछ दिनों पहले रविश से फोन पर बात हुयी थी, उन्होंने कहा था देश तो राहुल और मोदी संभल ही लेंगे, हमारी क्या जरुरत है, उस मुद्दे पर भी बात हुयी, मेरे ख्याल से ४-५ घंटो का सपना था, कुल मिला के पुरे दिन एक दोस्त के साथ सफर तय किया, हालाँकि सारे सपने सुबह के अलार्म के साथ खाक हो गए, और उस सपने का अंत जो मै अब तक सिर्फ लड़कियों के लिए ही देखा करता था।
मै कभी रविश से मिला नही पर उनकी बातो में खीझ से पता चलता है कि कोई सपनो का भारत है इस इंसान के मन में, जिसके लिए वो कोशिश करता है, कभी टूट भी जाता है पर फिर वो सपने उसे उठ खड़े होने को मजबूर कर देते हैं , जब वो बड़े बड़े सेमिनार में बिहार के कुछ ठेठ शब्द का इस्तेमाल बड़े शान से करता है तो लगता है की ये कोई लिखी पढ़ी बात नही बल्कि दिल की बाते बोल रहा है, क्यूंकि इंसान भावुकता में ही अपने आधार से जुड़ता है. शायद यही देशी और शुद्ध अंदाज ही हम जैसे लोगो को और करीब लाता है रविश के , हालाँकि ऐसी कई सारी बाते और भी हैं, अब भला सोचिये कोई बड़ा पत्रकार भला ये सोच सकता है कि ट्रेन में बिहार, यु पी के लड़के काला चश्मा , टी शर्ट पहन के क्यों घूमते हैं पुरी ट्रेन में, क्यूँ नीरी गर्मी में भी ऑटो में दोनों तरफ के परदे लगे हुए हैं, ये रविश का अनुभव और दूरदर्शिता ही तो है जो जी बी रोड के आसपास रहने वाले लोगो के बारे में सोचता है,
रविश से मेरा लगाव कुछ बातो से भी है जैसे ये लाइन शौके दीदार अगर है तो नजर पैदा कर, बचपन में कक्षा चार या पांच में हिंदी में पढ़ी थी ये लाइन और गाहे बगाहे लोगो से बातचीत में चिपकाता रहता हु इसे ,और रविश की भी ये पसंदीदा लाइन है, हालाँकि मेरा और उनका कोई मुकाबला नही पर मुकाबले नही तो क्या मुलाकात से भी गए ??
खैर आगे कुछ समझ नही आ रहा कि क्या लिखू तो बाकि जो है सो हइये है !!!!
बहुत दिनों से सोच रहा था कुछ लिखू पर नही लिख रहा था, पर कल जब पूरी रात रविश के साथ पत्रकारिता कि तो आज रोक नही पाया लिखने से, सुबह टहलते हुए मिलने से लेकर उनके घर पर ठेठ अंदाज में नहाने, खाने और झुग्गी झोपड़ी में घुस कर सवाल पूछने का सफर तय किया मैंने, बीच में फार्च्यूनर गाड़ी में सफर भी किया, और गप्पे भी लड़ाई, देश दुनिया की बाते भी करी, कुछ दिनों पहले रविश से फोन पर बात हुयी थी, उन्होंने कहा था देश तो राहुल और मोदी संभल ही लेंगे, हमारी क्या जरुरत है, उस मुद्दे पर भी बात हुयी, मेरे ख्याल से ४-५ घंटो का सपना था, कुल मिला के पुरे दिन एक दोस्त के साथ सफर तय किया, हालाँकि सारे सपने सुबह के अलार्म के साथ खाक हो गए, और उस सपने का अंत जो मै अब तक सिर्फ लड़कियों के लिए ही देखा करता था।
मै कभी रविश से मिला नही पर उनकी बातो में खीझ से पता चलता है कि कोई सपनो का भारत है इस इंसान के मन में, जिसके लिए वो कोशिश करता है, कभी टूट भी जाता है पर फिर वो सपने उसे उठ खड़े होने को मजबूर कर देते हैं , जब वो बड़े बड़े सेमिनार में बिहार के कुछ ठेठ शब्द का इस्तेमाल बड़े शान से करता है तो लगता है की ये कोई लिखी पढ़ी बात नही बल्कि दिल की बाते बोल रहा है, क्यूंकि इंसान भावुकता में ही अपने आधार से जुड़ता है. शायद यही देशी और शुद्ध अंदाज ही हम जैसे लोगो को और करीब लाता है रविश के , हालाँकि ऐसी कई सारी बाते और भी हैं, अब भला सोचिये कोई बड़ा पत्रकार भला ये सोच सकता है कि ट्रेन में बिहार, यु पी के लड़के काला चश्मा , टी शर्ट पहन के क्यों घूमते हैं पुरी ट्रेन में, क्यूँ नीरी गर्मी में भी ऑटो में दोनों तरफ के परदे लगे हुए हैं, ये रविश का अनुभव और दूरदर्शिता ही तो है जो जी बी रोड के आसपास रहने वाले लोगो के बारे में सोचता है,
रविश से मेरा लगाव कुछ बातो से भी है जैसे ये लाइन शौके दीदार अगर है तो नजर पैदा कर, बचपन में कक्षा चार या पांच में हिंदी में पढ़ी थी ये लाइन और गाहे बगाहे लोगो से बातचीत में चिपकाता रहता हु इसे ,और रविश की भी ये पसंदीदा लाइन है, हालाँकि मेरा और उनका कोई मुकाबला नही पर मुकाबले नही तो क्या मुलाकात से भी गए ??
खैर आगे कुछ समझ नही आ रहा कि क्या लिखू तो बाकि जो है सो हइये है !!!!