कल फेसबुक पर मम्मियों को प्यार करने वालो का ताता लगा हुआ था, जिनका इस दुनिया में आना उस माँ ने लिखा , लोग उस माँ पर तरह तरह की बाते लिख रहे थे, एक होड़ सी मच जाती है लोगो में ऐसे दिनों।
जो अपनी माँ को दो वर्ष पहले ही वृद्धाआश्रम छोड़ आये थे उनका भी प्यार फुट फुट कर छलक रहा था, मुझे गुरेज उनके प्यार से नहीं इस दिखावे से है, आखिर किस बात का दिखावा ? क्या दस बीस दोस्त माँ के प्यार वाली पोस्ट को लाइक कर देंगे तो साबित होगा हमारा प्यार ? क्या हमारा पूरा प्यार बस एक दिन के लिए है, पश्चिमी देशो में इस तरह के त्यौहार समझ में आते हैं जहां पुरे साल में ऐसे ही एक दो मौकों पर बेटे बेटियाँ अपने माँ बाप से मिलते हैं, पर क्या हिंदुस्तान में इस एक विशेष दिन की कोई उपयोगिता है ? जहां मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः का पाठ पढ़ाया जाता है और अब भी ज्यादातर लोगो द्वारा अनुसरित भी होता है, जहाँ अब भी अधिकतर घरों में माँ बाप ही घर के बड़े हैं और बिना उनके घर, घर नहीं लगता।
पश्चिमी देशो से हम सीख रहे हैं, ये अच्छी बात है, लेकिन क्या सीख रहे हैं ये देखने वाली बात है, हमने छोटे कपडे पहनना सीख लिया लेकिन हमने उन्हें देखने की मानसिकता अभी भी नहीं बदली, अभी भी हमारी निगाहे राह चलती लड़की को ऐसे ताड़ती हैं जैसे उस लड़की या महिला ने गुनाह कर दिया हो सड़क पर निकल कर , हमने कभी पश्चिमी देशो के समय प्रबंधन को सीखने की कोशिश नहीं करी, हम आज भी नौ बजे की मीटिंग में साढ़े नौ तक बमुश्किल पहुंचते हैं , पर मैंने किसी अमेरिकन या अंग्रेज को एक मिनट की देरी से भी पहुंचते नहीं देखा।
ये अच्छी बात है कि हमने मम्मी डे, पापा डे मनाना सीख लिया, लेकिन हमने अपने प्यार का दायरा इतना घटा दिया है कि वो इन्ही एक दो दिनों तक सिमट कर रह गया है, दिन ब दिन वृद्धाश्रमों की बढ़ती तादाद इस बात की पुष्टि भी करती है, हमारे विचार इतने खुले हो गए हैं की माँ बाप हमरे घरों में बोझ बन गए हैं, हम बागान फिल्म देखते देखते आंसू तो बहाते हैं पर अगले ही क्षण अपने घर में अपने बुजुर्गो से वैसा ही बर्ताव करते हैं। अपनी भावनाओ को प्रकट करना अच्छी बात है, परन्तु बेमन की भावना भी बस दिखाने मात्र के लिए होती है, हम दिखावटी के किस घुड़दौड़ में दौड़ रहे हैं, ये शायद हमें भी नहीं पता, शाम तक मुझे भी लगने लगा था कि कही मैंने गुनाह तो नहीं किया अपनी माँ की फोटो फेसबुक पे ना लगा के ?
हिंदुस्तान की पहचान यहाँ के रिश्तों की प्रगाढ़ता और संस्कारो के रूप में ही होती है, हम तो वैलेंटाइन भी पुरे दो महीने बसंत ऋतू के रूप में मनाते हैं , फिर ये तो हमारे माँ बाप हैं, इनकी तस्वीर साल के ३६५ दिन भी हम अपने दिलोदिमाग में ले के चले तो भी हमें कम लगता है,
मेरा बस इतना कहना है कि हम दिखावा भी करे तो उसका जिसका अस्तित्व हो, सिर्फ दिखाने के लिए न करे, जिस दिन इस हिंदुस्तान में एक भी वृद्धाआश्रम नहीं रहेगा, उस दिन मैं पुरे शान से mothers डे , fathers डे मनाऊंगा, पर उससे पहले मेरी हिम्मत नहीं ....