2019 का उन्नीस बीस
उन्नीस बीस..... बचपन से सुनता आया हूँ यह शब्द, हमारी गलतियों पर माँ का पापा से बोलना अरे बच्चे हैं उन्नीस बीस हो जाती है, पिता जी के कारोबार में घाटा होने पर माँ के समझाते हुए शब्द, कारोबार है उन्नीस बीस चलता रहता है, दोस्तों की नसीहत अबे जिंदगी है उन्नीस बीस लगा रहता है,
इन सबसे इतर राजनीति का उन्नीस बीस सबसे अलग और अनूठा है, कब कौन उन्नीसवे पायदान से सीधे इक्कीसवे और बीसवे से पहली पायदान पर खिसक जाये , पता ही नहीं चलता और यहाँ उन्नीस बीस होता नहीं, बल्कि सारी बीसाद ही इसी उन्नीस बीस पर टिकी है, जहाँ 2014 नरेंद्र मोदी के लिए बीसवीं पायदान पर चढ़ने जैसा था वहीँ 2019 उन्हें सीधे सौवीं या पहली सीढ़ी उतार फेंकेगा, हालाँकि विपक्ष के आसार देखते हुए उनके सौवी सीढ़ी पर जाना ज्यादा सहज दिखाई देता है, पर क्या सबकुछ इतना सहज है ?
एक तरफ जहाँ अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी ने घर में ही इतने विपक्षी खड़े कर लिए हैं वही दूसरी ओर पैना होता विपक्ष भी चिंता का सबब ही है और इन सबसे बड़ी बात है संघ की नाराजगी, एक तरफ जहाँ संघ अपनी विचारधारा को देश के हर कोने में प्रभावी रूप से फैलते हुए देख अपनी वर्षो की मेहनत को फलीभूत होते हुए देख रहा है तो वही उस विचार को व्यक्ति विशेष पर केन्दित होते देख व्यथित भी है, जहाँ तक मुझे लगता है संघ और संघ के मूल विचारो की जितनी हानि पिछले कुछ वर्षो में हुई है आज तक कभी नहीं हुई और यही बात संघ को साल रही है, और जहाँ तक मेरी जानकारी है नरेंद्र मोदी के विकल्प की चर्चा भी संघ के अंदरखाने में होने लगी है, हालाँकि यह सब इतना आसान नहीं है पर जो संगठन अन्ना आंदोलन से लेकर कांग्रेस के कायापलट तक की कहानी लिख सकता है उसे एक और कहानी लिखने में कोई समस्या नहीं आनी चाहिए, मोदी के करीबी दत्तात्रेय होसबोले को नकार कर हालाँकि संघ ने अपनी नाराजगी और ताकत दोनों का एहसास पहले ही करा दिया है.
जहाँ २०१४ में राजनाथ चुनाव की पूरी कमान मोदी के देने के बावजूद इस ताक में बैठे रहे की बहुमत ना आने के बाद अन्य पार्टियों को रिझा कर प्रधानमंत्री बन जायेंगे और इसकी बानगी उन्होंने खुद को लखनऊ से अपना चुनाव क्षेत्र चुन कर किया, पर किस्मत को कुछ और मंजूर था, वही अब २०१९ के आम चुनावो में संघ इस ताक में बैठा रहेगा कि बहुमत ना आने के उपरांत प्रधानमंत्री का चेहरा कौन होगा ? राजनाथ सिंह या कोई और .... हालाँकि नरेंद्र मोदी ने राजनाथ की शक्तियों को इतना कुंद कर दिया है कि वो खुद अब इस बात के लिए सोच भी नहीं रहे होंगे, पर संघ के पास एक चेहरा है जो विकास शील भी है, संघ का करीबी है, हिंदूवादी है , और संघ के गढ़ से भी है और विरोधियो को स्वीकार्य भी , जिसके मंत्रालय की विरोधी भी दबे स्वर में खूब तारीफ कर रहे हैं , कुल मिलाकर २०१४ की तरह ही २०१९ की लड़ाई भी नरेंद्र मोदी को अंदर और बाहर दोनों जगह लड़नी पड़ेगी,
२०१४ के विरोधी निष्क्रिय थे तो २०१९ के सजग, २०१४ में अंदरखाने का साथी शातिर था तो २०१९ का साथी संगठनात्मक रूप से मजबूत, कुल मिलाकर रंगमंच का मंचन शानदार होगा, और जनता जनार्दन का सदा की तरह फिर से संहार होगा, !!इति कथा !!