सीता का "नारीवाद"
आज की इक्कीसवी सदी जहाँ नए नए आयाम तय करने का दावा करती है वही कुछ नए शब्दों को आम प्रचलन में लाने और उन्हें अपने मन मुताबिक नयी परिभाषा गढ़ने में भी बहुत आगे रही है , हालाँकि जो इन शब्दों को गढ़ और मढ़ रहे हैं उन्हें ना ही इसका शाब्दिक अर्थ पता है ना ही व्यापक, पर छद्मता और लोलुपता की इस दुनिया में पूरी तरह से उन्हें भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
उन्ही शब्दों में से एक शब्द है "फेमिनिज्म" जिसका आधुनिक शाब्दिक अर्थ है पति/बॉयफ्रेंड/दूसरा पति इत्यादि को गरियाना और सिगेरट, दारू पी कर रात के १२ बजे घर में बवंडर मचाना, किसी के सवाल उठाने पर उसको डबल एनर्जी के साथ गरियाना इत्यादि व्यापक अर्थो में आते हैं, बात यही ख़त्म हो जाती तो चलो ठीक था पर बात सतयुग तक जाती है, तुमने क्या मुझे सीता समझ रखा है जो तुम्हारे बोलने पर जंगल चली जाउंगी, साले पूरे खानदान को बर्बाद कर के जाउंगी , ऐसे मधुर वाक्य तथाकथित फेमिनिज्म के उदाहरण स्वरुप व्यक्त किये जाते हैं, जितना उदाहरण सीता और राम का केवल इस सन्दर्भ में दिया जाता है उतना तो शायद गोस्वामी तुलसीदास ने भी पूरे रामचरित मानस में वर्णन नहीं किया होगा, और तो और कुछ पुछल्ले लेखक सीता को एक डकैत औरत से तुलना करने से भी पीछे नहीं हटते।
मुझे आश्चर्य और सहानुभूति है ऐसे लोगो से जो अपनी दाल रोटी चलाने मात्र के लिए राम और सीता को भी गरियाने से पीछे नहीं हटते, ऐसे लोगो से जिन्हे राम एक कठोर पुरुषवादी व्यक्ति दिखाई देते हैं और सीता एक दीन, लाचार महिला , वही सीता जिनका स्वयंवर उनकी रखी शर्तो के अनुसार हुआ था, वही सीता जिन्होंने अपना जीवनसाथी अपनी शर्तो पर चुना था, पर शायद लिविंग रिलेशनशिप में रहना मात्र ही फेमिनिज्म कहलाता है, इसलिए सीता का फेमिनिज्म या नारीवाद किसी को दिखाई नहीं देता ?
सीता ने जन्म से लेकर पृथ्वी में समाहित होने तक एक सशक्त महिला का परिचय दिया, स्वयंवर में उसे चुना जिसे उन्होंने अपने काबिल समझा, वनवास वह इसलिए गयी क्यूँकि वह जीवनसाथी का दुःख की घडी में भी साथ देना चाहती थी, रावण द्वारा अपहरण किये जाने पर भी उन्हें अपने साथी पर भरोसा था कि वह एक दिन आएगा और इस लंका से मुझे छुड़ा कर ले जायेगा और शायद उनका यह दृढ़ विश्वास ही था कि राम को विजय प्राप्त हुई, अयोध्या में प्रवेश करने और महारानी बनने के बाद वह सिंहासन पर राम के बराबरी में बैठती थी ना कि महल में आराम फरमाती थी, रामदरबार की किसी भी छायाचित्र से आप इस कथन की पुष्टि कर सकते हैं, राम के द्वारा जंगल भेज दिए जाने पर भी उन्होंने कोई हंगामा नहीं खड़ा किया, अबला होने या पति द्वारा अन्याय होने का रोना नहीं रोया , अपितु अपने आप पर भरोसा जताते हुए दो पुत्रो के लालन -पालन, शिक्षा दीक्षा की भूमिका का सर्वोत्तम निर्वहन किया, और पृथ्वी में समाहित होने से पहले उन दो पुत्रो को एक राज्य के उत्तराधिकारी जैसा काबिल बनाकर उनके पिता को सौंपा, वो चाहती तो फिर से महारानी बन सकती थी पर अपने राजा पति को प्रजा के सामने लज्जित होने का कोई अवसर नहीं देना चाहती थी , ऐसी थी माता सीता और ऐसा था उनका सशक्त नारीवाद !
आज के इस छद्म नारीवाद के युग में यह बहुत जरुरी है कि सीता के नारीवाद की फिर से स्थापना हो, नारी स्वावलम्बी बने पर किसी को नीचा दिखाकर नहीं, पुरुष के बराबर में या उससे उच्च स्थान पर बैठे पर उसकी बुरी आदतों की बराबरी करके नहीं, अपना जीवनसाथी अपने अनुरूप खुद से चुने पर माता पिता के आशा और अरमानो पर पानी फेरकर नहीं, उनकी स्वीकृति लेकर ..... बस इतना सा ही !!
मुझे आश्चर्य और सहानुभूति है ऐसे लोगो से जो अपनी दाल रोटी चलाने मात्र के लिए राम और सीता को भी गरियाने से पीछे नहीं हटते, ऐसे लोगो से जिन्हे राम एक कठोर पुरुषवादी व्यक्ति दिखाई देते हैं और सीता एक दीन, लाचार महिला , वही सीता जिनका स्वयंवर उनकी रखी शर्तो के अनुसार हुआ था, वही सीता जिन्होंने अपना जीवनसाथी अपनी शर्तो पर चुना था, पर शायद लिविंग रिलेशनशिप में रहना मात्र ही फेमिनिज्म कहलाता है, इसलिए सीता का फेमिनिज्म या नारीवाद किसी को दिखाई नहीं देता ?
सीता ने जन्म से लेकर पृथ्वी में समाहित होने तक एक सशक्त महिला का परिचय दिया, स्वयंवर में उसे चुना जिसे उन्होंने अपने काबिल समझा, वनवास वह इसलिए गयी क्यूँकि वह जीवनसाथी का दुःख की घडी में भी साथ देना चाहती थी, रावण द्वारा अपहरण किये जाने पर भी उन्हें अपने साथी पर भरोसा था कि वह एक दिन आएगा और इस लंका से मुझे छुड़ा कर ले जायेगा और शायद उनका यह दृढ़ विश्वास ही था कि राम को विजय प्राप्त हुई, अयोध्या में प्रवेश करने और महारानी बनने के बाद वह सिंहासन पर राम के बराबरी में बैठती थी ना कि महल में आराम फरमाती थी, रामदरबार की किसी भी छायाचित्र से आप इस कथन की पुष्टि कर सकते हैं, राम के द्वारा जंगल भेज दिए जाने पर भी उन्होंने कोई हंगामा नहीं खड़ा किया, अबला होने या पति द्वारा अन्याय होने का रोना नहीं रोया , अपितु अपने आप पर भरोसा जताते हुए दो पुत्रो के लालन -पालन, शिक्षा दीक्षा की भूमिका का सर्वोत्तम निर्वहन किया, और पृथ्वी में समाहित होने से पहले उन दो पुत्रो को एक राज्य के उत्तराधिकारी जैसा काबिल बनाकर उनके पिता को सौंपा, वो चाहती तो फिर से महारानी बन सकती थी पर अपने राजा पति को प्रजा के सामने लज्जित होने का कोई अवसर नहीं देना चाहती थी , ऐसी थी माता सीता और ऐसा था उनका सशक्त नारीवाद !
आज के इस छद्म नारीवाद के युग में यह बहुत जरुरी है कि सीता के नारीवाद की फिर से स्थापना हो, नारी स्वावलम्बी बने पर किसी को नीचा दिखाकर नहीं, पुरुष के बराबर में या उससे उच्च स्थान पर बैठे पर उसकी बुरी आदतों की बराबरी करके नहीं, अपना जीवनसाथी अपने अनुरूप खुद से चुने पर माता पिता के आशा और अरमानो पर पानी फेरकर नहीं, उनकी स्वीकृति लेकर ..... बस इतना सा ही !!
