Wednesday, 23 September 2015

मैं हिन्दू हूँ

हिन्दू, मुसलमान या सेक्युलर होना, मै समझता हूँ गाली नही है, कट्टर होना भी एक हद तक ठीक है, पर एक दूसरे के घर में सेंध लगाना या सेंध लगाने के लिए कुछ भी बोलना या कुछ भी करना ये कही से भी ठीक नही है ?
मै हिन्दू हूँ और इस बात को मै बड़े शान से बोलता हूँ क्यूकि जो हिंदुत्व मैंने पढ़ा है वो सर्व धर्म सद्भाव सिखाता है, वैमनश्य कतई नही।  घर में जब पूजा होती है तो पूजा के ख़त्म होने के बाद पंडित जी हमेशा एक बात बुलवाते है , मनुष्य का उत्थान हो, विश्व का कल्याण हो, वो ये कभी नहीं बुलवाते की हिन्दू मात्र का कल्याण हो और बाकि धर्म का विनाश हो, जो लोग कट्टरता का चोला ओढ़े हुए हैं क्या उनके पास कोई और गीता पुराण है ? धर्म एक पहचान होता है, एक दिनचर्या होती है लड़ने का विषय नही, ये विचार का विषय हो सकता है पर विचारो को किसी पर थोपने की जुगत कभी नहीं।
धर्म में रुढ़िवाद हो सकता है जिसका समय दर समय समीक्षा और उन्मूलन जरुरी है, कल तक विधवा औरत को हर धार्मिक  कार्य से दूर रखना धर्म का हिस्सा था आज नही है, रजस्वला औरत को मासिक धर्म के दिनों रसोई घर में घुसने नही दिया जाता था आज वैसा नही है कुछ एक घरो को छोड़ दें तो , कहने का मतलब यही है की तब ये चलन बन गया था और फिर धर्म का एक हिस्सा, वजह वैज्ञानिक थे पर हमने इसको धर्म से जोड़ के देखा,
पहले तांबे के सिक्के पानी में फेंके जाते थे, वजह जल को और ऊर्जावान बनाना पर आज भी हम सिक्के फेंकते हैं जबकि आज सिक्के सिल्वर या लोहे के होते हैं और हम इसको धर्म का हिस्सा मानते हैं, ऐसे हज़ारो उदहारण हैं जिससे हम ये समझ सकते हैं की आज की दिनचर्या कल हमारे आदर्श बन जाते हैं, मैं ये नही कहता की अपने पूर्वजो की दी हुई सौगात को हम झुठलाए, पर उसके पीछे की वजह और आज परिस्थितियों को अवश्य ध्यान में रखे,
किसी अच्छी बात पर कट्टर बने  गलत रूढ़िवादी बात पर नही, धर्म का अनुसरण करे, प्रचार प्रसार करे पर थोपे नहीं।
वसुधैव कुटुम्बकम 

Monday, 14 September 2015

हिंदी दिवस

किसी को बोल दो की आपकी हिंदी थोड़ी ख़राब है तो वो खिस निपोर कर कहता है, You Know I am little poor in Hindi, और उसी इंसान को बोल दो की आपकी इंग्लिश थोड़ी Weak है तो तनुआ के कहता है How can you say this to me, you shoud focus on your English first, rather giving suggestion to anybody else ..और ना जाने कितनी डिगरिया गिनवा देगा इंग्लिश की, लोग इतना प्यार करते हैं अपनी मातृभाषा से?
कारण कई हैं, हमने हिंदी को इस तरह से परियोजित किया है अपने दिनचर्या के व्यवहार में तथा अन्य जीवनोपयोगी साधनो में कि वह  किसी को आकर्षित करती नही दिखती, भाषा का आकर्षण मात्र हिंदी उसके चरम पर नही पंहुचा सकती,
हिंदी का लोगो तक ना पहुचना और पहुचने की कोशिश भी ना करना, इसके पीछे सिर्फ वो जिम्मेदार नहीं है, बल्कि सरकार और कई सारे अन्य मशीनरिया जिम्मेदार हैं।  
गलती उनकी  कतई नही है जो हिंदी नही बोलते या नहीं बोलना चाहते,  जिस उपेक्षा भरी नजरो से देखा जाता है हिंदी बोलने वालो को कि उसकी मज़बूरी हो जाती है अपने आप को टिप टॉप बनाने की, अंग्रेजी बोलने की,   अगर हमें हिंदी को बढ़ावा देना है तो तो सबसे पहले सोच बदलनी होगी,  हिंदी बोलने वाले को ये आभास दिलाना होगा की हिंदी बोलना या जानना कोई अपराध नही, पर वो हिंदी जान के कर भी क्या लेगा ? वकील बना तो कोर्ट में बहस नही कर पायेगा, एप्लीकेशन नही लिख पायेगा, इंजीनियर बना तो प्रेजेंटेशन नही दे पायेगा , लेखक बना तो खाए बिना मर जायेगा
कोई दूसरी  भाषा जानना या उसमे पारंगत होना भी कोई अपराध नही, वो भी तब जब जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं उसमे ही सन्निहित हो, परन्तु अपनी भाषा को ना जानना या ना जानने की प्रवित्ति रखना कहा तक उचित है, दिल्ली विश्वविद्यालय के स्नातक वर्ग के परीक्षा में एक बार परीक्षार्थी ये पूछ रहे थे कक्ष  निरीक्षक से की अथवा का मतलब या होता है या और, कक्ष निरीक्षक मै था, सन्न रह गया था उस सवाल से.
बस मुझे युवा का हिंदी से इस तरह बेरुख हो जाना सताता है, और हिंदी का यूँ मजबूर हो जाना,
बाकी हिंदी दिवस की हिंदी में हार्दिक बधाई !

Saturday, 5 September 2015

गुरु गोविन्द

बचपन से मुझे एक ऐसे इंसान की तलाश थी जो मेरे हर छोटे ,बड़े गलत सही बात का जवाब दे सके और मुझे बता सके की क्या सही है क्या गलत है, हर गुरु पूर्णिमा जब माँ पिता जी अपने गुरु के पास जाते थे तो लगता था की क्या मुझे भी ऐसे गुरु मिलेंगे जिन्हे मै  दिल और दिमाग दोनों से गुरु मानूंगा ? प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा  तक कई पढ़ाने  वाले बताने वाले लोग मिले पर कोई गुरु नहीं मिला, हा श्री कृष्ण को मै  हमेशा अपने सैद्धांतिक गुरु मानता था, मानता हूँ , पर मुझे उस गुरु की तलाश थी जिसे मै  मुझे समझाते  हुए देख सकूँ, और जिसके सामने बैठ कर लगे कि  मै  तो कुछ जानता  ही नहीं, और मेरी तलाश एक दिन ख़त्म हुई जब कुछ महीनो पहले माननीय गोविंदाचार्य जी से मिला  और उनसे मिलकर लगा की मै  तो शून्य हूँ और वो ज्ञान की खान, जमीन से जुड़ा उनका अनुभव, २०० वर्ष आगे देखने की शक्ति, मनुष्य को उसके बोलने से आंकने का  हुनर, ना  जाने और कितने गुण  और ज्ञान से भरा है उनका मस्तिष्क , जीवन और देश का कोई ऐसा पहलु नही जिसपे उनका अनुभव और दूरदर्शी सोच ना  झलकती हो , मैंने अपने सामाजिक, राजनीतिक , शैक्षणिक दौर मै  गोविन्द जी जैसा विद्वान  ना  ही देखा ना  ही सुना और ना  ही भविष्य में किसी ऐसे अद्वितीय विद्वान से मिलने के आसार हैं क्यूंकि मै  नहीं समझता की जीवन के हर क्षेत्र का अनुभव और ज्ञान उनसे अच्छा  कोई रखता होगा , ऐसे गुरु गोविन्द , गोविन्द जी को गुरु गोविन्द वाले दिवस मै  शत शत नमन करता हूँ 

रातो रात दिग्विजय से खड्गे ?

                                                रातो रात दिग्विजय से खड्गे  ? एक बार फिर कांग्रेस में या यूँ कहें कि परिवार में राहुल गाँधी ...