पथरीले हुए जा रहे हृदय और बनावटी रिश्तो के लिए मुझे इससे सटीक शब्द नहीं मिला, भविष्य में कोई मिलेगा तो परिवर्तन के लिए अवश्य सोचूंगा ! वैसे भी जिस विषय में लिख रहा हूँ, उसमे इतने परिवर्तन देखे हैं मैंने की इस रिश्ते के नाम तक से भरोसा उठ गया है।
आज जब आस पास देखता हूँ तो सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि क्यों हमारे रिश्ते गुड्डा गुड़िया के खेल से होते जा रहे हैं, हालाँकि उनका भी रिश्ता प्रतीकात्मक रूप से एक साल तो चलता ही था, "था " क्योंकि अब वो खेल भी विडियोगेम में परिवर्तित हो गया है। आज अगर अपने आस पास दृष्टि डाले तो समझ आता है कि ये रिश्ते बोझ से बन गए हैं ?
पति पत्नी अपने सास ससुर के साथ नहीं रह सकते क्योंकि उन्हें प्राइवेसी चाहिए, एक पडोसी अपने पडोसी के बारे में इसलिए नहीं जानना चाहता क्योंकि कही वो चाय पीने ना आ जाये उसके घर।
फेसबुक पर my लाइफ, माय स्वीट हस्बैंड कहने में पत्नी नहीं झिझकती पर बंद कमरे में अब पति ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन बन गया है, खैर अभी मैं सिर्फ उस रिश्ते की बात करूँगा जो वाकई में रिश्ता रह ही नहीं गया है, बस एक दिखावा ,status सिंबल, या मात्र एक दिनचर्या बन रह गया है , वो रिश्ता जो आपको सड़क पर चलते हुए, ऑटो के भीतर, मेट्रो, बस, थोड़ा high- fi हुआ तो hotels में या यूँ कही हर जगह दिख जायेगा, पर दुर्भाग्य की बात है कि बस दिखता ही है, एक खोखला हो चूका रिश्ता, जँहा ना रिश्तो की समझ है ना उसकी कदर, तेरा/ तेरी BF, GF है तो मेरा/मेरी भी है, वाली सोच ने हम युवाओ को कहा ला के छोड़ा है, समझ नहीं पाता हूँ ? महीने दो महीने में break up , tie up कम से कम मेरे समझ से तो परे है।
आखिर क्यों इतना कमजोर हो गया है रिश्ता? वजह हम हैं या कोई और ?
और सबसे ज्यादा दिखने वाला रिश्ता जो किसी के अभिव्यक्ति की आज़ादी है तो किसी के आंख की किरकरी, किसी के लिए just having fun है तो किसी के लिए जीने मारने का साथ, पर यह जीने मरने का साथ अब सिर्फ बातों में ही रह गया है, इसकी वास्तविकता महज एक खोखली कल्पना है।
जब हम किसी से जुड़ते हैं, तो एक भाव से , इस भाव की वजह अभाव या प्रभाव या दोनों हो सकता है, मानता हूँ , पर जुड़ने के बाद भी अगर अभाव और प्रभाव जैसे शब्द रिश्तो में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं तो वह कोई प्यार मोहब्बत नहीं, महज एक जरुरत है, और यह जरुरत इक्के दुक्के लोगो में नहीं अपितु हर किसी में पायी जाने लगी है, जरा सोचिये कैसे कोई बात आप पर या आपके रिश्ते पर इस कदर भारी पड़ जाती है कि आपका जन्मो जन्मो तक साथ रहने का वादा, कभी हाथ ना छोड़ने का वादा, सुख दुःख हमेशा साथ निभाने का वादा धरा का धरा रह जाता है, हम कुछ दिन शोक मनाते हैं और फिर किसी ऐसे तथाकथित जीवनसाथी और प्यार की तलाश में निकल पड़ते हैं, मुझे समस्या हर रोज रिश्ते बदलने से नहीं , रिश्ते में किये गए वादे, देखे या मात्र दिखाए गए सपनो से है, अगर रिश्ता किसी विशेष प्रयोजन मात्र के लिए है तो यह पारस्परिक रूप से स्वीकृत होना चाहिए, किसी एक की सोची समझी साजिश नहीं।
और साजिश ना भी हो तो कम से कम हमें यह जरूर सोचना चाहिए कि क्या कोई बात इतनी महत्वपूर्ण हो सकती है जो रिश्ता ख़त्म कर दे ? जब हम किसी से जुड़ते हैं तो उसके सुख दुःख, कमियाँ अच्छाइयाँ , अच्छी बुरी सारी बातों से जुड़ते हैं, अगर किसी एक से कोई छोटी या बड़ी गलती हो भी जाती है तो यह आपका कर्त्तव्य है कि उसे सही करे, ना कि उसे उस अवस्था में छोड़ दें, ऐसे तमाशा देखने वाले तो सब हैं, फिर आप किसलिए ? सोचियेगा जरूर !! किसी से नाता तोड़ने से पहले अपने वादों को एक बार याद जरूर करियेगा !!
!! रुदन !!

