Tuesday, 14 November 2017

प्यारीले रिश्ते

                 पथरीले हुए जा रहे हृदय और बनावटी रिश्तो के लिए मुझे इससे सटीक  शब्द  नहीं मिला, भविष्य में कोई मिलेगा तो परिवर्तन के लिए अवश्य सोचूंगा ! वैसे भी जिस विषय में लिख रहा हूँ, उसमे इतने परिवर्तन देखे हैं मैंने की इस रिश्ते के नाम तक से भरोसा उठ गया है।
                 आज जब आस पास देखता हूँ तो सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ   कि  क्यों हमारे रिश्ते गुड्डा गुड़िया के खेल से होते जा रहे हैं,  हालाँकि उनका भी रिश्ता प्रतीकात्मक रूप से एक साल तो चलता ही था, "था " क्योंकि अब वो खेल भी विडियोगेम  में परिवर्तित हो गया है।  आज अगर अपने आस पास दृष्टि  डाले  तो  समझ आता है कि  ये रिश्ते बोझ से बन गए हैं ?
              पति पत्नी अपने सास ससुर के साथ नहीं रह सकते क्योंकि उन्हें प्राइवेसी चाहिए, एक पडोसी अपने पडोसी के बारे में इसलिए नहीं जानना चाहता क्योंकि कही वो चाय पीने  ना  आ जाये उसके घर। 
                फेसबुक पर my लाइफ, माय स्वीट हस्बैंड कहने में पत्नी नहीं झिझकती पर बंद कमरे में अब पति ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन बन गया है, खैर अभी मैं  सिर्फ उस रिश्ते की बात करूँगा जो वाकई में रिश्ता रह ही नहीं गया है, बस एक दिखावा ,status सिंबल, या मात्र एक  दिनचर्या बन रह गया है , वो रिश्ता जो आपको सड़क पर चलते हुए, ऑटो के भीतर, मेट्रो, बस, थोड़ा high- fi हुआ तो hotels में  या यूँ कही हर जगह दिख जायेगा, पर दुर्भाग्य की बात है कि  बस दिखता  ही है, एक खोखला हो चूका रिश्ता, जँहा  ना  रिश्तो की समझ है ना उसकी कदर, तेरा/ तेरी  BF, GF  है तो मेरा/मेरी  भी है, वाली सोच ने हम युवाओ को  कहा ला के छोड़ा है, समझ नहीं पाता  हूँ ? महीने दो महीने में break up , tie  up कम  से कम मेरे समझ से तो परे  है।
आखिर क्यों इतना कमजोर हो गया है रिश्ता? वजह हम हैं या कोई और ?
              और सबसे ज्यादा दिखने वाला रिश्ता जो किसी के अभिव्यक्ति की आज़ादी है तो किसी के आंख की किरकरी, किसी के लिए just  having fun  है तो किसी के लिए जीने मारने का साथ, पर यह जीने मरने का साथ अब सिर्फ बातों में ही रह गया है, इसकी वास्तविकता महज एक खोखली कल्पना है। 
                जब हम किसी से जुड़ते हैं, तो एक भाव से , इस भाव की वजह  अभाव या प्रभाव या दोनों हो सकता है, मानता हूँ , पर जुड़ने के बाद भी अगर अभाव  और प्रभाव जैसे शब्द रिश्तो में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं तो वह कोई प्यार मोहब्बत नहीं, महज एक जरुरत है, और यह जरुरत इक्के दुक्के लोगो में नहीं अपितु हर किसी में पायी जाने लगी है, जरा सोचिये कैसे कोई बात आप पर या आपके रिश्ते पर इस कदर भारी पड़ जाती है कि आपका जन्मो जन्मो तक साथ रहने का वादा, कभी हाथ ना छोड़ने का वादा, सुख दुःख हमेशा साथ निभाने का वादा धरा का धरा रह जाता है, हम कुछ दिन शोक मनाते हैं और फिर किसी ऐसे  तथाकथित जीवनसाथी और प्यार की तलाश में निकल पड़ते हैं, मुझे समस्या हर रोज रिश्ते बदलने से नहीं , रिश्ते में किये गए वादे, देखे या मात्र दिखाए गए सपनो से है, अगर रिश्ता किसी विशेष प्रयोजन मात्र के लिए है तो यह पारस्परिक रूप से स्वीकृत होना चाहिए, किसी एक की सोची समझी साजिश नहीं।  
             और साजिश ना भी हो तो कम  से कम हमें यह जरूर सोचना चाहिए कि क्या कोई बात इतनी महत्वपूर्ण हो सकती है जो रिश्ता ख़त्म कर दे ? जब हम किसी से जुड़ते हैं तो उसके सुख दुःख, कमियाँ  अच्छाइयाँ , अच्छी बुरी सारी बातों से जुड़ते हैं, अगर किसी एक से कोई छोटी या बड़ी गलती हो भी जाती है तो यह आपका कर्त्तव्य है कि उसे सही करे, ना कि उसे उस अवस्था में छोड़ दें, ऐसे तमाशा देखने वाले तो सब हैं, फिर आप किसलिए ? सोचियेगा जरूर !!  किसी से नाता तोड़ने से पहले अपने वादों को एक बार याद जरूर करियेगा !!


                                                      !! रुदन !!

Sunday, 5 November 2017

तुम कौन हो ?

                                                            तुम कौन हो ?
कौन हो तुम ?
कई बार कौंधा है यह सवाल ,
तुम्हारे जेहन में ,
आँसुओ की गुफ्तगू में ,
आँखों के उछलते प्रेम में ,
मेरी बाँहों की उमड़ती दरिया में,
और प्यार के उस झंझावात में भी। 
                                     जवाब ?
                                     अब  भी अधूरा है !
                                     मेरी जिंदगी का और,
                                     तुम्हारे सवालो का !!
कौन हो तुम ? आखिर कौन हो तुम !
मेरी सांसो के चलने का जरिया तो नहीं ?
मेरी हंसी, मुस्कराहट का दरिया तो नहीं ?
कोई रंग ना चढ़े, वो रंग करिया तो नहीं ?
मेरे शब्द, मेरे प्रेम और इन आँसुओ का इकलौता जरिया तो नहीं ?
                                         या तुम ,
                                        आधार हो, अभिमान हो, जीवन  की हर मुस्कान हो !
                                        सम्मान हो, मेरी प्राण हो, मुश्किलों का समाधान हो !
                                         तुम कृष्ण हो, राधे हूँ , मै आध्यात्म , तुम विज्ञान हो !
                                         तुम प्रिये हो मै प्रियतमा, मै अधमरा तुम प्राण हो !
                                           
मेरी सृष्टि रचनाकार हो, क्या यही  तुम लाचार हो ?
मेरे जीव का आधार हो , कहो कैसे तुम निराधार हो ?
आचार हो, अनिवार्य हो , तुम रक्त का संचार हो।  
मै सूक्ष्म प्राणी मात्र हूँ, तुम ईश  का अवतार हो ! 
                           हे प्रिये ! तुम इस जीव के कण कण में विद्यमान हो !
                            सामर्थ्य हो हर पग की, तुम सर्व शक्तिमान हो !
                            संघर्ष हर धड़कन की , तुम जीव रूपी प्राण हो !
                            अभिराम हो, संकल्प हो, सौंदर्य का अभिज्ञान हो !
                             अब क्या कहूं तुम्हे हे प्रिये, तुम मेरी जीवनदान हो !!
                                              !! तुम मेरी जीवनदान हो !!

      

Wednesday, 1 November 2017

विधवा सड़क

                                                             !!   विधवा सड़क  !!
दिन भर दनदनाते और हिनहिनाते हम जब दो, तीन, चार या दस पहिया वाहनों को लेकर गिट्टी, तारकोल से बनी  सड़को को जब रौंदते हैं, तो हमें इसके रौंदे जाने का तनिक भी एहसास नहीं होता, मुझे भी नहीं हुआ था अभी तक, हाँ थोड़ी हमदर्दी हमें अपने पहियों की  होती  है जब सड़क अपनी बाँहों में कोई भारी  भरकम पत्थर रख कर लेट जाती है , या चोटिल होकर  गड्ढेनुमा घावों  से हमारा सामना  करवाती है , पर कभी ये एहसास हमें झकझोर नहीं पाया कि  सुग्घर दुल्हन जैसी सड़क कैसी खुरदरी सी हो गयी है ?
               कल रात  अचानक सुनसान सड़क पर निगाह पड़ी तो अनायास मुँह  से निकला देखो  जब पूरी दुनिया  दिन भर थक हार  के रात  के आगोश में अपनी पत्नी/ प्रियतमा के साथ चैन की नीद सो रहा है तब ये सड़क विधवा सी हो गयी है, पूरे  दिन अपने ऊपर कइयों  का भार  झेलने वाली अकेली शांत सी पड़ी हुई है एक अगली सुबह की इंतज़ार में , हालाँकि यह कहना कठिन है कि  वह अगली सुबह चाहती है या वह कोई सुबह नहीं चाहती ? इस सड़क को विधवा  कहना भी हालाँकि कहाँ तक सही है,  उसका आंकलन भी मै  अभी तक नहीं कर पा  रहा हूँ , कभी लगता है यह वह वैश्या  है जो पूरी जवानी रौंदी जाती है, चूसी  जाती है पर पूरे  जीवन में कोई उसका हमदर्द नहीं होता और ज्यों ही वह कही से टूटने  लगती है या बूढी होने  लगती है लोग उसका परित्याग करने लगते हैं जैसे टूटी और पुरानी  सड़क पर जाना कोई पसदं नहीं करता, जैसे  तुलनात्मक रूप से  महंगी होने के बावजूद  भी हम सुडौल और अच्छी दिखने वाली को ही अपनी पहली पसंद मानते है वैसे ही लम्बी दूरी  और टोल इत्यादि के खर्चो  के बावजूद भी हम सपाट सड़क पकड़ना पसंद करते हैं , कभी यह सड़क घर की उस जिम्मेदार महिला की तरह लगती है जो पति, पुत्र, सास ,ससुर, देवर इत्यादि अनेक रिश्तों को इतनी बखूबी से निभाती है और उनकी हर आवश्यकता पूरी करती है , अन्य शब्दों में सुबह नीद से जगाने से लेकर रात  में अच्छी नीद सुलाने तक का ठेका उसी के पास होता है , उसे अपने किसी भी काम की कोई शाबाशी कभी नहीं मिलती पर एक छोटी सी गलती का भी जिम्मेदार उसे ठहरा दिया जाता है।  
                  जैसे जीवन के किसी भी गलत का ठीकरा घर की स्त्री पर फोड़ दिया जाता है , जैसे बिस्तर पर आनंद से दूर होते हर क्षण का जिम्मेदार स्त्री को ठहरा दिया जाता है वैसे ही रास्ते की हर समस्या का जिम्मेदार सड़क को  ठहरा दिया जाता है, संयोग या वियोग की बात यह है कि  निर्जीव सड़क भी स्त्रीलिंग के रूप में ही प्रयोग होती है, यह भी एक शोध का विषय है कि  स्त्री की समानता के वजह से स्त्रीलिंग के रूप में प्रयोग हुआ या अन्य व्याकरण की  वजह से ??
                    हालाँकि इन सब के बावजूद भी, वह हमें अपने मंजिल तक जरुर पँहुचाती है, कोई थोड़ी देर से तो कोई समय से पहले, ठीक उसी तरह जैसे एक स्त्री एक पुरुष के जीवन को बिस्तर से लेकर जीवन के हर पथ तक उसे  मंजिल से मिलवाती है, अगर यह स्त्री और सड़क हमारे जीवन में नहीं में नहीं होती तो सोचिये जीवन कितना कठिन और अव्यवस्थित होता ? मंजिल तक पँहुचाने  वाला साथी ना  हो तो सोचिये, कैसा होगा सफर ? और हाँ एक बार इस सड़क के बारे में भी जरूर सोचियेगा ?? #रुदन 

रातो रात दिग्विजय से खड्गे ?

                                                रातो रात दिग्विजय से खड्गे  ? एक बार फिर कांग्रेस में या यूँ कहें कि परिवार में राहुल गाँधी ...