!! विधवा सड़क !!
दिन भर दनदनाते और हिनहिनाते हम जब दो, तीन, चार या दस पहिया वाहनों को लेकर गिट्टी, तारकोल से बनी सड़को को जब रौंदते हैं, तो हमें इसके रौंदे जाने का तनिक भी एहसास नहीं होता, मुझे भी नहीं हुआ था अभी तक, हाँ थोड़ी हमदर्दी हमें अपने पहियों की होती है जब सड़क अपनी बाँहों में कोई भारी भरकम पत्थर रख कर लेट जाती है , या चोटिल होकर गड्ढेनुमा घावों से हमारा सामना करवाती है , पर कभी ये एहसास हमें झकझोर नहीं पाया कि सुग्घर दुल्हन जैसी सड़क कैसी खुरदरी सी हो गयी है ?
कल रात अचानक सुनसान सड़क पर निगाह पड़ी तो अनायास मुँह से निकला देखो जब पूरी दुनिया दिन भर थक हार के रात के आगोश में अपनी पत्नी/ प्रियतमा के साथ चैन की नीद सो रहा है तब ये सड़क विधवा सी हो गयी है, पूरे दिन अपने ऊपर कइयों का भार झेलने वाली अकेली शांत सी पड़ी हुई है एक अगली सुबह की इंतज़ार में , हालाँकि यह कहना कठिन है कि वह अगली सुबह चाहती है या वह कोई सुबह नहीं चाहती ? इस सड़क को विधवा कहना भी हालाँकि कहाँ तक सही है, उसका आंकलन भी मै अभी तक नहीं कर पा रहा हूँ , कभी लगता है यह वह वैश्या है जो पूरी जवानी रौंदी जाती है, चूसी जाती है पर पूरे जीवन में कोई उसका हमदर्द नहीं होता और ज्यों ही वह कही से टूटने लगती है या बूढी होने लगती है लोग उसका परित्याग करने लगते हैं जैसे टूटी और पुरानी सड़क पर जाना कोई पसदं नहीं करता, जैसे तुलनात्मक रूप से महंगी होने के बावजूद भी हम सुडौल और अच्छी दिखने वाली को ही अपनी पहली पसंद मानते है वैसे ही लम्बी दूरी और टोल इत्यादि के खर्चो के बावजूद भी हम सपाट सड़क पकड़ना पसंद करते हैं , कभी यह सड़क घर की उस जिम्मेदार महिला की तरह लगती है जो पति, पुत्र, सास ,ससुर, देवर इत्यादि अनेक रिश्तों को इतनी बखूबी से निभाती है और उनकी हर आवश्यकता पूरी करती है , अन्य शब्दों में सुबह नीद से जगाने से लेकर रात में अच्छी नीद सुलाने तक का ठेका उसी के पास होता है , उसे अपने किसी भी काम की कोई शाबाशी कभी नहीं मिलती पर एक छोटी सी गलती का भी जिम्मेदार उसे ठहरा दिया जाता है।
जैसे जीवन के किसी भी गलत का ठीकरा घर की स्त्री पर फोड़ दिया जाता है , जैसे बिस्तर पर आनंद से दूर होते हर क्षण का जिम्मेदार स्त्री को ठहरा दिया जाता है वैसे ही रास्ते की हर समस्या का जिम्मेदार सड़क को ठहरा दिया जाता है, संयोग या वियोग की बात यह है कि निर्जीव सड़क भी स्त्रीलिंग के रूप में ही प्रयोग होती है, यह भी एक शोध का विषय है कि स्त्री की समानता के वजह से स्त्रीलिंग के रूप में प्रयोग हुआ या अन्य व्याकरण की वजह से ??
हालाँकि इन सब के बावजूद भी, वह हमें अपने मंजिल तक जरुर पँहुचाती है, कोई थोड़ी देर से तो कोई समय से पहले, ठीक उसी तरह जैसे एक स्त्री एक पुरुष के जीवन को बिस्तर से लेकर जीवन के हर पथ तक उसे मंजिल से मिलवाती है, अगर यह स्त्री और सड़क हमारे जीवन में नहीं में नहीं होती तो सोचिये जीवन कितना कठिन और अव्यवस्थित होता ? मंजिल तक पँहुचाने वाला साथी ना हो तो सोचिये, कैसा होगा सफर ? और हाँ एक बार इस सड़क के बारे में भी जरूर सोचियेगा ?? #रुदन

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