Sunday, 22 April 2018

जरूरतों का साथी

                                                         ! जरूरतों का साथी !

               हम सब किसी "अपने", मित्र, सगे, सम्बन्धी से क्यूँ  जुड़ते हैं ? कभी सोचा है आपने ? कोई पहले जान पहचान वाला, फिर अच्छा जान पहचान वाला, फिर मित्र, घनिष्ठ मित्र  और फिर इष्ट मित्र बन जाता है , क्यों ? क्या आप या वह आपसे बहुत प्यार करता है ? एक जैसा सोचते हैं ? बहुत सारी  आदते मिलती हैं ? वगैरह वगैरह ...... यही सोचते हैं ना आप ?
                 वाकई में ऐसा है तो फिर यही घनिष्ठ मित्रता एक दिन घोर दुश्मनी में क्यों बदल जाती है (हालाँकि यह हमेशा , हर रिश्ते में नहीं होता ), बिना एक दूसरे से मिले दिन ना गुजरने वाले दिन अचानक "इस मनहूस की शकल दिख गयी, अब ना जाने आज का दिन कैसे बीतेगा " वाले दिन में कैसे बदल जाता है ? 
                  इन सारे क्यों, कैसे का एक ही जवाब है, जरुरत, Requirement, हजारो प्रकार की जरूरते,  शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सांख्यिक इत्यादि, प्रथम दृष्टया काफी अटपटा सा लग रहा होगा कि नहीं ऐसा नहीं होता, पर आप जब अपने किसी रिश्ते की गहराई में जायेंगे तो आपको यही एहसास होगा कि दुनिया का हर रिश्ता कहीं ना कहीं किसी ना किसी जरुरत से बंधा हुआ है, कुछ दिखते हैं कुछ नहीं।  हालाँकि आपका अनुभव इससे इतर से हो सकता है, पर सच से इतर नहीं, हम भावनाओ में इतने अभिभूत होते है की ऐसा सोचने की हिम्मत तक नहीं करते पर जब वही रिश्ते आपको आँख दिखाने  लगते हैं तब शायद हमें सच्चाई का एहसास होता है। 
                      मै भी यही सोचता था या यूँ कहूं कि  सोचता हूँ कि  रिश्ते जरूरतों से नहीं दिल से बनते हैं , पर मेरी इस सोच पर अब मेरा दिल ही यकीन करने से इंकार करने लगा है, मैंने हर रिश्ते की शुरुआत में पहले अपनी जीत और फिर अपना शुकुन देखा और उस शुकुन को ही ढूँढने की कोशिश की, कही कुछ वक़्त के लिए शुकुन मिला तो कही शुकुन की बानगी तो कहीं  शुकुन आने की सम्भावना मात्र से संतोष करना पड़ा, पर जितनी जल्दी इस शब्द का भ्रम टूटा  उतनी  ही  जल्दी असली  शुकुन को खोज पाया, हर शुरुआत पर यूँ खुश होता था कि यह खोज का अंत है पर हर अंत से पहले और दलदल में फंसता चला गया, मेरी हर जीत वाकई में उन सबकी जीत थी, किसी की शारीरिक तो किसी की मानसिक, किसी की भौतिक तो किसी की रासायनिक, उनके हर एक प्रयोग और जीत में मै एक सिपाही मात्र था भले ही मुझे हर वक़्त यह एहसास रहा हो कि मै  सिपाहसलार  था , पर यह सच्चाई थी , है और रहेगी ,यह बात मै बहुत देर से समझ पाया, हालाँकि समझ कर भी कुछ खास फर्क नहीं पड़ा, अब भी जब जो चाहे मुझे फिर से झांसे में डाल लेता है।  
                        उपर्युक्त पंक्तियों का आप क्या मतलब निकालेंगे मुझे नहीं पता पर इतना मतलब जरूर निकालिएगा कि रिश्ते जरुरत  से ही बनते हैं, दिल से नहीं, अगर आप कहीं दिल से कोई रिश्ता बना पाए हो तो आपको बधाई, आप वाकई में बधाई के पात्र हैं, पर मै इस बधाई का पात्र कभी नहीं हो पाउँगा ,हालाँकि कोशिश कभी रुकेगी नहीं और जिनके बारे में ये लिखा है, उनसे मै सिर्फ यही कहना चाहूँगा की आपकी ख़ुशी, चाहत,  या समृद्धि से मुझे शिकायत नहीं बल्कि संतुष्टि है, जो मेरी वजह से मिला उसके लिए मै खुद अपनी पीठ थपथपा लूंगा और जो आपको मेरे बाद मिला उसके लिए आप सिर्फ और सिर्फ बधाई के पात्र हैं , बस अंतिम शब्दों में -

                                   !!वो रौंद कर मेरे दिल की धड़कन, हर रोज मुनाफा करते हैं 
                                   हम समझ इसे बस इश्क मुहब्बत, हर वक़्त गुजारा करते हैं !!
    

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