Wednesday, 11 March 2020

मध्य प्रदेश का असली महाराज

                                                     मध्य प्रदेश का असली महाराज
लोग कहते हैं सियासत संभावनाओं से भरी हुई है, कौन कब क्या कदम उठाएगा कभी कभार उसका अनुमान लगाना भी कठिन होता है, शायद राहुल गाँधी ने भी यही अनुमान लगाया होगा कि उनके सखा श्रीमान सिंधिया कभी उन्हें छोड़ कर नहीं जायेंगे, पर अपने पिता की 75 वी वर्षगांठ पर सिंधिया ने उन्हें छोड़ने के फैसला ले ही लिया और अगले ही दिन दूसरा दामन भी थाम लिया, 18  वर्ष के कांग्रेस के  राजनीतिक कार्यकाल में 17  वर्ष सांसद, 10  वर्ष मंत्री रहे सिंधिया आखिकार बीजेपी में क्यों शामिल हुए , और उनके बीजेपी में शामिल होने से सबसे बड़ा फायदा किसका होगा ये दोनों बाते बहुत ही महत्वपूर्ण  हैं ?
ज्योतिरादित्य को यह पता है कि बीजेपी में शामिल हो जाने के बावजूद भी वह कभी मध्यप्रदेश की राजनीति में अग्रणी भूमिका में नहीं आ पायेंगे (यदि नहीं पता तो यह उनका राजनीतिक अल्पज्ञान ही समझा जायेगा ) जिसकी इच्छा उन्हें हमेशा से रही है ना ही वह कभी केंद्र की राजनीति किसी बड़े पद पर आ पायेंगे क्यूँकि बीजेपी में आना तो बड़ा आसान है पर अपनी जमीन तलाशना उतना ही मुश्किल, हालाँकि जहाँ तक मुझे लगता है ज्योतिरादित्य यहाँ वह सब तलाशने भी नहीं आये हैं, जिस अभिमानी ज्योतिरादित्य को मै जानता हूँ उस ज्योतिरादित्य का सिर्फ और सिर्फ एक मकसद है अपने अंदरूनी विरोधियो को सबक सिखाना, उनके इस दांव से हो सकता है उनके विरोधियो को तत्कालिक हानि पँहुच भी जाये ,पर दूरगामी स्तर पर हानि सिर्फ और सिर्फ ज्योतिरादित्य की ही है, ये सबको ज्ञात है कि अगर इस पाँच साल के बाद कांग्रेस की सरकार मध्य प्रदेश में आती भी तो कमलनाथ कभी भी मुख्यमंत्री नहीं बनते, और दिग्विजय सिंह तो अब दौड़ में रहे ही नहीं, उस स्थिति में केवल और केवल एक नेता होता जिसे मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलती और जिसका जिक्र राहुल गाँधी ने 2018 के अपने ट्वीट में किया भी था और जिसे आज उन्होंने  रीट्वीट भी किया- दो सबसे ताकतवर योद्धा - समय और धैर्य, हालाँकि ज्योतिरादित्य ने 15 महीनो का धैर्य रखा पर अंततः उनके धैर्य का बांध टूट गया. हाल की स्थिति में यह कहना जल्दबाजी होगी कि अगले कुछ दिनों में मध्य प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी, हालाँकि जब तक मध्य प्रदेश में दिग्विजय जैसा संगठन कर्ता और कमलनाथ जैसा घाघ  और धनपशु हो वहाँ किसी की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता, खैर सरकार रहे या ना रहे , मध्य प्रदेश और कांग्रेस का  एक महत्वपूर्ण चेहरा दोनों परिस्थितियों में विजयी रहेगा और वह चेहरा और नाम है दिग्विजय सिंह।
एक समय राहुल के करीबियों में से एक दिग्विजय को जब करीबी से बाहरी का रास्ता दिखा दिया गया तब भी उन्होंने हार नहीं मानी, वह लगातार संघर्ष करते रहे और अंततः मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार उनकी वजह से ही बनी, वो कभी खुल कर सामने नहीं आये यहाँ तक कि चुनाव में जब राहुल की सभा होती थी तब भी उन्हें दूर रखा जाता था और महत्वपूर्ण बैठकों में भी उनकी भागीदारी कम ही होती थी पर उनकी अहमियत हमेशा कायम रही, टिकट बंटवारे में भी और मंत्री पद के बंटवारे में भी, सरकार बनने के बाद उनका दूसरा लक्ष्य था ज्योतिरादित्य  को  मध्य प्रदेश की सत्ता से दूर रखना जिसमे वह शत प्रतिशत कामयाब भी रहे और उसी का नतीजा है कि आज ज्योतिरादित्य ने 
भाजपा की सदस्यता ग्रहण की. दिग्विजय सिंह अपने बेटे को विधायक और बाद में अहम् मंत्रालय दिलवा चुके है और ज्योतिरादित्य के विपरीत अपने मिलनसार व्यवहार के बदौलत पिता दिग्विजय की भांति जयवर्धन  क्षेत्र की जनता और कार्यकर्ताओ में खासे पसंद किये जाते हैं. तो अब यदि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार नहीं भी बचती है तो यह तय है कि  कांग्रेस की तरफ से मध्य प्रदेश के  अगले महाराज जयवर्धन ही होंगे, और ज्योतिरादित्य के इस कदम से हो सकता है राहुल गाँधी को भी यह एहसास हो कि दिग्विजय सिंह उनके वह सिपाही हैं जो  हमेशा उनके लिए खड़े रहेंगे क्यूंकि जितनी अनदेखी और ज्यादती दिग्विजय सिंह के साथ हुई है उसका 10 वा हिस्सा भी ज्योतिरादित्य के साथ नहीं हुई, फिर भी दिग्विजय सिंह पार्टी के साथ खड़े रहे और जितना मै उनको जानता हूँ जीवन पर्यन्त खड़े रहेंगे, तो सरकार बचने  की स्थिति में दिग्विजय का कद जहाँ और बढ़ेगा वही सरकार न बनने की स्थिति में भी उनके और उनके बेटे के लिए रास्ता साफ होने वाली कहावत चरितार्थ होती दिख रही है। 

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