मेरे भी कल आंसू निकले तो क्या मै भी अब नापाक हूँ ,
रौंद डालोगे मुझे बस इसलिए की मै मियां अख़लाक़ हूँ
रौंद डालोगे मुझे बस इसलिए की मै मियां अख़लाक़ हूँ
अंग्रेजो की दी हुई सौगात को हम कब तक ढोयेंगे, समझ नही आता , कब हम ये समझेंगे की हम इंसान पहले, हिन्दू मुस्लमान बाद में हैं , साक्षरता दर सत्तर प्रतिशत पहुंच गयी पर ऐसा लगता है कि सोच का प्रतिशत अभी भी शून्य है। हिन्दू घर वापसी में लगा हुआ है तो मुस्लमान जिहाद को पालने पोसने में , अगर यही घर वापसी पूंजा गोकुल दास मेघ जी की भी हो गयी होती तो हालत कुछ और होते, पर तब तो ये कह दिया गया की हिन्दू धर्म में जाने का रास्ता है आने का कोई रास्ता नही फिर आज काहे की घर वापसी, ये दोहरा चरित्र क्यों ? और मुसलमानो के कौन से कुरान में लिखा गया है की जिहाद मतलब हिन्दुओ का क़त्ल ?
अरे ये समाज के कुछ ठेकेदार हैं जो अपनी रोजी रोटी चलाने के लिए रोज धर्म के नाम पर मरने वाले राम सजीवन और मोहम्मद कयूम को खोज लाते हैं , हम में से नब्बे प्रतिशत लोग इस बात को जानते भी हैं और समझते भी हैं पर यही लोग मार काट करने के लिए भी सबसे पहले आगे आते हैं।
एक बुजुर्ग को सिर्फ अफवाहों की वजह से मार दिया गया ? अरे मारना ही है तो उनको मारो जिन्होंने भारत को गाय का मांस निर्यात करने वाले देशो की श्रेणी में प्रथम स्थान पर ला कर खड़ा कर दिया है। धर्म के बारे में सोचना है तो यहाँ सोचो ? कैसे भारत दूसरे स्थान से प्रथम स्थान पर आ गया जबकि देश में उस पार्टी की सरकार है जो गाय के मांस पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने की बात करती है ? गाय के मांस पर पूर्ण प्रतिबन्ध होना चाहिए ये हिन्दू धर्म के लिए ही नही पुरे देश के हित में है, पर एक हत्या के बाद दूसरी हत्या ? ये कही से भी उचित नही है , हम किसी भी पार्टी या धर्म को मानने वाले हो ? पर हमें एक जान की कीमत का अंदाजा जरूर होना चाहिए, हमें ये जरूर सोचना चाहिए की वो किसी का बेटा है, किसी का बाप है , हो सकता है पूरा घर उसके भरोसे जी रहा हो ? आज हमने एक अख़लाक़ को मारा तो देखिये पुरे देश में कही से राम सजीवन तो कही कन्हैया के मारे जाने की खबर आ रही है , मीडिया इस मुद्दे को तब तक हवा देगी कब तक कोई बड़ा दंगा नही हो जाता क्युकि उनकी रोजी रोटी उसी पे टिकी है, नेता इस मुद्दे पर तब तक राजनीति करते रहेंगे जब तक कि कोई दूसरा अख़लाक़ नही मर जाता।
सारांश बस यह है की हमें अपनी सोच को उस स्तर तक ले जाना होगा जहां हम कोई निर्णय खुद ले सके, किसी के बहकावे ये कहे सुने में आ के ना कुछ कहे ना कुछ करें, क्युकि अगला अख़लाक़ या राम सजीवन आप भी हो सकते है इसमें कोई दो राय नही ??
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