मेरे कई मित्रो और जानने वालो ने पूछा की कवयित्री सम्मलेन क्यों ? कवि सम्मलेन क्यों नही ?
मेरा जवाब था कवयित्री सम्मलेन क्यों नही ? उस जवाब के जवाब में इधर उधर की बातें , कुछ ज्ञान कुछ दकियानूसी सोच, कुछ तो कुछ भी , ये जवाब उन सभी ऐसा सोचने वालो के लिए है...
भारत जैसे पुरुष प्रधान देश जहाँ हमेशा से ही औरतो को एक हासिये पर रखा गया, उनके हौसले, प्रतिभा, करतब, जज्बे को एक मज़ाक के अलावा कुछ नही समझ गया, उस पुरुष प्रधान देश जहाँ अस्पताल के बाहर ये लिखना पड़ता है कि यहाँ लिंग परीक्षण नही होता, जहाँ सिर्फ नारी को अपने आप को पाक साफ दिखने के लिए अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता हो, उस देश में ये कल्पना करना कि उनके नाम पर या उन्हें धयान में रख कर किसी विषय में सोचा गया हो, एक अतिशयोक्ति ही होगी , अगर हम कविता की भी बात करें तो केवल कवि सम्मलेन, क्या कवि ही सोच सकता है ? क्या वही लिख सकता है ? तो फिर उसके नाम का ही सम्मलेन क्यों ?
वो नारी जो माँ है, बहन है, प्रेयसी है, एक परिवार का आधार है ,जिसके दिल में अथाह प्रेम का सौन्दर्य है , जो अपनी बाते अगर कविता में कहना शुरू करे तो मैं समझता हूँ बड़े बड़े कवि ढिगने से प्रतीत होंगे और ऐसा हुआ भी है। महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान का नाम जहाँ आ जाये वहाँ हमें और किसी कवि की सुध नहीं रहती पर क्यों सिर्फ गिने चुने नाम ही हैं जब बात कवयित्रियों की आती है तो , वजह सिर्फ एक उनकी उपेक्षा !!
आज भी हर रोज कही ना कही कवि सम्मेलन होते रहते हैं हालाँकि कवयित्रिओं को भी मौका दिया जाता है पर कवि सम्मलेन ही क्यों ? कवयित्री सम्मलेन क्यों नहीं ?
बस इसी प्रश्न ने मुझे ये आयोजन और एक शुरुआत करने की शक्ति और प्रेरणा दी, और इस मुहीम को एक मुकाम तक ले जाऊंगा इस बात का मुझे पूर्ण विश्वास है। .
जय हिन्द !!
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