! राधा बनना असंभव ही तो है !
बचपन में जब राधे कृष्ण और सीता राम की ध्वनि कानो में पड़ती थी तो सबसे मेरा यही सवाल होता था कि सीता तो राम की पत्नी थीं पर राधा ? उनका नाम कृष्ण के साथ क्यों, हालाँकि उसका जवाब अभी तक कोई दे नहीं पाया या जिसने भी दिया वह मुझे संतुष्ट नहीं कर पाया।
कृष्ण प्रेम तो रुक्मिणी और अन्य रानियों से भी करते ही रहे होंगे, लगभग हर धार्मिक पुस्तक में यही वर्णित है कि रुक्मिणी लक्ष्मी की अवतार थीं फिर कृष्ण अवतार में राधा को वरीयता क्यों ? क्यों समाज राधा की अपने पति के साथ किये को गलत नहीं कह पाता और कृष्ण के साथ प्रेम को पूजता है ? क्या जो लोग राधा को पूजते हैं वो अपनी पत्नी को किसी पराये पुरुष के लिए राधा बन जाने देंगे या कोई स्त्री किसी पुरुष के लिए राधा बन जाने के लिए तैयार है ? शायद इन सारी बातों का जवाब हममे से किसी के भी पास नहीं।
कृष्ण के पास भी शायद राधा के सवालो का जवाब नहीं रहा होगा, राधा के होने के बावजूद भी उन्हें रुक्मिणी या अन्य रानियों की आवश्यकता ही क्यों पड़ी ? यदि अन्य रानियां थी भी तो राधा को उसका अधिकार क्यों नहीं मिला, क्यों राधा को कृष्ण के महल में एक दासी बनकर रहना पड़ा ? इतिहास इस बात को कभी नहीं बताता।
इन सारे सवालो के जवाब मेरे पास भी नहीं है और शायद मै इनके जवाब इसलिए ढूंढ रहा हूँ क्यूँकि मुझे अपने मन मस्तिष्क को शांत करना है, मुझे अपने आप को यह समझाना है शायद कि मै जो कर रहा हूँ वह सही है , पर मेरा दिल कहता है कि यह पाप है , अन्याय है उसके साथ जिसको राधा की संज्ञा दे दी है , मुझे ज्ञात है उसे राधा बनने की नहीं रुक्मिणी बनने की इच्छा है, उसे अमर नहीं होना उसे जीना है, उसे इतिहास नहीं वर्तमान बनना है और मुझे बनाना भी है पर ........ इस पर पे आकर घडी की सुई मानो अटक सी गयी है, वह कहती है बंद घडी भी दिन में दो बार सही समय दिखाती है पर मैं तो एक बार भी सही समय दिखाने लायक नहीं, महान बनने की कोशिश करते करते घिन्न सी आने लगी है खुद से, पर ना जाने उसे अब तक मुझसे नफरत क्यों ना हुई ? मुझे खुद से हो गयी है पर उसे क्यों नहीं ? मुझे तो मुझसे ज्यादा जानती है फिर क्यों नहीं ? कल उसके फैसले में जो प्रण था और आँखों में जो आंसू उन्हें जीवन की सबसे बड़ी हार मानता हूँ,उसे लगा उसके फैसले से बहुत खुश था मै, पर मेरी ख़ुशी के पीछे की आत्मग्लानि समझ नहीं पायी, गलती उसकी नहीं उसके व्यवहार की है, मेरी हर बुरी बात में अच्छा देखने का व्यवहार, मेरे हर झूठ को सच मान लेने का व्यवहार, मेरे साथ हर क्षण को जी लेने का व्यवहार, मेरी जिंदगी को अपनी साँस मान लेने का व्यवहार , वो समझ भी नहीं पायी कि हर रण में जीतने वाला कल हार गया। पर मै तुम्हे नहीं हारने दूँगा, जीवन की हर जंग जीतोगी तुम, ये मेरी हार है तुम्हारी नहीं, तुमने तो सर्वस्व दिया, जिसके लायक मै था भी नहीं वह भी।
तुम राधा नहीं बन सकती, कभी नहीं, अगर बनी तो हमारी हार होगी, तुम हमेशा रुक्मिणी बनने के लिए ही हो और वही बने रहना, कभी किसी के लिए राधा मत बनना !! कभी नहीं !!
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