तुम कौन हो ?
कौन हो तुम ?
कई बार कौंधा है यह सवाल ,
तुम्हारे जेहन में ,
आँसुओ की गुफ्तगू में ,
आँखों के उछलते प्रेम में ,
मेरी बाँहों की उमड़ती दरिया में,
और प्यार के उस झंझावात में भी।
जवाब ?
अब भी अधूरा है !
मेरी जिंदगी का और,
तुम्हारे सवालो का !!
कौन हो तुम ? आखिर कौन हो तुम !
मेरी सांसो के चलने का जरिया तो नहीं ?
मेरी हंसी, मुस्कराहट का दरिया तो नहीं ?
कोई रंग ना चढ़े, वो रंग करिया तो नहीं ?
मेरे शब्द, मेरे प्रेम और इन आँसुओ का इकलौता जरिया तो नहीं ?
या तुम ,
आधार हो, अभिमान हो, जीवन की हर मुस्कान हो !
सम्मान हो, मेरी प्राण हो, मुश्किलों का समाधान हो !
तुम कृष्ण हो, राधे हूँ , मै आध्यात्म , तुम विज्ञान हो !
तुम प्रिये हो मै प्रियतमा, मै अधमरा तुम प्राण हो !
मेरी सृष्टि रचनाकार हो, क्या यही तुम लाचार हो ?
मेरे जीव का आधार हो , कहो कैसे तुम निराधार हो ?
आचार हो, अनिवार्य हो , तुम रक्त का संचार हो।
मै सूक्ष्म प्राणी मात्र हूँ, तुम ईश का अवतार हो !
हे प्रिये ! तुम इस जीव के कण कण में विद्यमान हो !
सामर्थ्य हो हर पग की, तुम सर्व शक्तिमान हो !
संघर्ष हर धड़कन की , तुम जीव रूपी प्राण हो !
अभिराम हो, संकल्प हो, सौंदर्य का अभिज्ञान हो !
अब क्या कहूं तुम्हे हे प्रिये, तुम मेरी जीवनदान हो !!
!! तुम मेरी जीवनदान हो !!

बहुत बढ़िया बहुत मार्मिक
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