हिन्दू, मुसलमान या सेक्युलर होना, मै समझता हूँ गाली नही है, कट्टर होना भी एक हद तक ठीक है, पर एक दूसरे के घर में सेंध लगाना या सेंध लगाने के लिए कुछ भी बोलना या कुछ भी करना ये कही से भी ठीक नही है ?
मै हिन्दू हूँ और इस बात को मै बड़े शान से बोलता हूँ क्यूकि जो हिंदुत्व मैंने पढ़ा है वो सर्व धर्म सद्भाव सिखाता है, वैमनश्य कतई नही। घर में जब पूजा होती है तो पूजा के ख़त्म होने के बाद पंडित जी हमेशा एक बात बुलवाते है , मनुष्य का उत्थान हो, विश्व का कल्याण हो, वो ये कभी नहीं बुलवाते की हिन्दू मात्र का कल्याण हो और बाकि धर्म का विनाश हो, जो लोग कट्टरता का चोला ओढ़े हुए हैं क्या उनके पास कोई और गीता पुराण है ? धर्म एक पहचान होता है, एक दिनचर्या होती है लड़ने का विषय नही, ये विचार का विषय हो सकता है पर विचारो को किसी पर थोपने की जुगत कभी नहीं।
धर्म में रुढ़िवाद हो सकता है जिसका समय दर समय समीक्षा और उन्मूलन जरुरी है, कल तक विधवा औरत को हर धार्मिक कार्य से दूर रखना धर्म का हिस्सा था आज नही है, रजस्वला औरत को मासिक धर्म के दिनों रसोई घर में घुसने नही दिया जाता था आज वैसा नही है कुछ एक घरो को छोड़ दें तो , कहने का मतलब यही है की तब ये चलन बन गया था और फिर धर्म का एक हिस्सा, वजह वैज्ञानिक थे पर हमने इसको धर्म से जोड़ के देखा,
पहले तांबे के सिक्के पानी में फेंके जाते थे, वजह जल को और ऊर्जावान बनाना पर आज भी हम सिक्के फेंकते हैं जबकि आज सिक्के सिल्वर या लोहे के होते हैं और हम इसको धर्म का हिस्सा मानते हैं, ऐसे हज़ारो उदहारण हैं जिससे हम ये समझ सकते हैं की आज की दिनचर्या कल हमारे आदर्श बन जाते हैं, मैं ये नही कहता की अपने पूर्वजो की दी हुई सौगात को हम झुठलाए, पर उसके पीछे की वजह और आज परिस्थितियों को अवश्य ध्यान में रखे,
किसी अच्छी बात पर कट्टर बने गलत रूढ़िवादी बात पर नही, धर्म का अनुसरण करे, प्रचार प्रसार करे पर थोपे नहीं।
वसुधैव कुटुम्बकम
मै हिन्दू हूँ और इस बात को मै बड़े शान से बोलता हूँ क्यूकि जो हिंदुत्व मैंने पढ़ा है वो सर्व धर्म सद्भाव सिखाता है, वैमनश्य कतई नही। घर में जब पूजा होती है तो पूजा के ख़त्म होने के बाद पंडित जी हमेशा एक बात बुलवाते है , मनुष्य का उत्थान हो, विश्व का कल्याण हो, वो ये कभी नहीं बुलवाते की हिन्दू मात्र का कल्याण हो और बाकि धर्म का विनाश हो, जो लोग कट्टरता का चोला ओढ़े हुए हैं क्या उनके पास कोई और गीता पुराण है ? धर्म एक पहचान होता है, एक दिनचर्या होती है लड़ने का विषय नही, ये विचार का विषय हो सकता है पर विचारो को किसी पर थोपने की जुगत कभी नहीं।
धर्म में रुढ़िवाद हो सकता है जिसका समय दर समय समीक्षा और उन्मूलन जरुरी है, कल तक विधवा औरत को हर धार्मिक कार्य से दूर रखना धर्म का हिस्सा था आज नही है, रजस्वला औरत को मासिक धर्म के दिनों रसोई घर में घुसने नही दिया जाता था आज वैसा नही है कुछ एक घरो को छोड़ दें तो , कहने का मतलब यही है की तब ये चलन बन गया था और फिर धर्म का एक हिस्सा, वजह वैज्ञानिक थे पर हमने इसको धर्म से जोड़ के देखा,
पहले तांबे के सिक्के पानी में फेंके जाते थे, वजह जल को और ऊर्जावान बनाना पर आज भी हम सिक्के फेंकते हैं जबकि आज सिक्के सिल्वर या लोहे के होते हैं और हम इसको धर्म का हिस्सा मानते हैं, ऐसे हज़ारो उदहारण हैं जिससे हम ये समझ सकते हैं की आज की दिनचर्या कल हमारे आदर्श बन जाते हैं, मैं ये नही कहता की अपने पूर्वजो की दी हुई सौगात को हम झुठलाए, पर उसके पीछे की वजह और आज परिस्थितियों को अवश्य ध्यान में रखे,
किसी अच्छी बात पर कट्टर बने गलत रूढ़िवादी बात पर नही, धर्म का अनुसरण करे, प्रचार प्रसार करे पर थोपे नहीं।
वसुधैव कुटुम्बकम
Nice
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