Sunday, 8 November 2015

बिहार चुनाव की समीक्षा

                                    लालटेन के तेल ने ऐसा तीर चलाया है,
                              हाथ मिला एक दूजे से कीचड़  में कमल घुसाया है 
आज लालू ने सिद्ध कर दिया कि  उनसे बड़ा राजनीतिज्ञ कोई नहीं है, हासिये पर पड़े होने के बाद एक बार फिर  किंग मेकर बन जाना ये उनकी सूझ बुझ और राजनीतिक समझ को दर्शाता है , समीकरण और कारण जो भी हैं पर लालू ने जो  लामबंदी की उसका अच्छा परिणाम आज मिला, साथ में नितीश की साफ सुथरी छवि और उनके द्वारा किया गया काम. कांग्रेस में जो थोड़ी बहुत जान आई उसका श्रेया बिना किसी संदेह राहुल को जाना चाहिए 
पर इन सबका ये मतलब नहीं की अमित शाह की रणनीति में अब वो धार नही, ये उनकी रणनीति ही थी कि उनको पहले और दूसरे चरण के चुनाव के बाद ही पता चल गया था की वो कही ना कही पीछे  हो रहे हैं और फिर उन्होंने अपना रामबाण छोड़ा, जो कि नही चल पाया, कारण लोगो ने पहले अपनी जात देखी, बाद में धर्म, मोदी का डीएनए वाले बयान का भी नितीश बाबू ने खूब फायदा उठाया, एवं भागवत जी के बयान का लालू ने, क्या है कि बिहारी भाइयो ने इन सब बातो को दिल पर ले लिया। ५३ सीट जितने के बावजूद भी एक चौथाई प्रतिशत मत पाना ये अमित शाह के राम बाण का ही नतीजा है, जो बुद्धजीवी और पत्रकार ये विश्लेषण कर रहे हैं की अमित शाह का ये दांव उल्टा पड़ गया उन्हें एक बार फिर से इस पर  विश्लेषण करना चाहिए, जहा तक मेरी समझ है ये दांव आने वाले उत्तर प्रदेश में कारगर साबित हो सकते हैं, पर अगर इस के अलावा ही चुनाव हो तो ज्यादा बेहतर है, 
दूसरी तरफ मुस्लिम मतदाताओ के पास महागठबंधन के अलावा और कोई विकल्प नही था, उनकी तथाकथित चहेती पार्टिया एक साथ थी तो  उनके वोट का विभाजन नही हो पाया और उसका नतीजा हम सब के सामने है, बाकि ज्यादा दिमाग ना लगाइये, देखिये अगले पांच साल जेपी के चेले क्या क्या करते हैं  ??

Thursday, 22 October 2015

आततायी रावण, क्या सच में ?

बचपन से लेकर अब तक हमारे बीच रावण एक आततायी के रूप में परोसा गया, पुतले फूंकते हुए बड़े हुए हैं हम, रावण की तुलना हमेशा असत्य और राम की सत्य से की गयी , पर क्या कभी हमने ये समझने की कोशिश करी क्या रावण सच में इतना बुरा था, कि  हमें हर वर्ष उसका पुतला फूंकना पड़ता है? क्या राम सच में इतने आदर्श थे कि  उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाये या राम के महिमांडन मात्र के लिए रावण को इतना बुरा बना दिया गया ?
मानता हूँ  रावण ने अपनी असीम शक्तियों का गलत प्रयोग किया , पर क्या इंद्र ने नहीं किया ? फिर इंद्र को देवता और रावण को राक्षस क्यों ? क्या इसलिए की उसने कुछ असंभव कार्यो को पूरा करने का बीड़ा उठाया था, या इसलिए कि  उसने अपनी बहन के नाक कान  काटने वाले की बीबी को कैद कर लिया था ?
आज के आधुनिक समाज की भी  बात करू तो हर इंसान अपनी घर की औरतो को लेकर बहुत ही सजग और भावुक है , रावण भी था तो उसमे क्या गलत ? उसने सीता के साथ कुछ  गलत तो नहीं किया कभी और ना  ही कोई ग्रन्थ ये सिद्ध करते हैं कि  उसके मन में भी सीता के लिए कुछ गलत था, उसने सीता को प्रस्ताव जरुर दिया था पर उस हिसाब से तो आज हिंदुस्तान का हर दूसरा इंसान रावण है फिर हम अपने उस रावण रूपी भाव को ना  जला  के रावण के पुतले को क्यों जलाते हैं ?  वो राम जिसके लिए सीता ने अपना सब कुछ त्याग दिया, उस सीता को वनवास भेजने से पहले एक भी बार नहीं सोचा, और वो रावण जिसने इतने दिनों तक सीता को अपने क्षेत्र में कैद रखा कभी स्पर्श तक नहीं किया? किसको महान मानते हैं आप ?
रावण इतना ही बुरा था तो क्यों राम  ने लक्ष्मण को उसके पास ज्ञान लेने के लिए भेजा था और राम ने जब शिव लिंग की स्थापना रामेश्वर में करायी तो पूजा रावण से क्यों करायी ? और उसी रावण ने राम को विजयी भवः  का आशीर्वाद भी दिया था जब लिंग  स्थापना के बाद राम ने उसके पैर छुए थे , उसी विद्वान रावण ने मृत्यु के समय लक्ष्मण से कहा कि  युद्ध में राम नही मै  विजयी हुआ हूँ, क्युकि मेरे जीते जी राम मेरे राज्य में प्रवेश नहीं कर पाये जबकि राम के जीते जी मै  उनके धाम बैकुंठ में प्रवेश करने  जा रहा हु, ऐसे विद्वान और सर्वज्ञानी रावण को हम कैसे सिर्फ असत्य और अधर्म की उपमा मान लेते हैं, यह एक सोचने का और बहस का विषय है ?
मुझे लगता है रावण का पुतला फूंकने से अच्छा है कि   हम अगर रावण को जिन कार्यो या गलत अफवाहों की वजह से गलत मानते हैं उन आदतो को अपने अंदर से मारे, ये दिखावे मात्र से हम राम को तो आदर्श बना सकते है पर ना  ही राम की अच्छाइयों को अपने अंदर ल सकते हैं ना  रावण की बुराइयो को मार सकते हैं, बाकी दशहरा की हार्दिक शुभकामनाये !!

Friday, 9 October 2015

बिहरवा के चुनाव

अगर बारीकी से देखे तो बिहार चुनाव अभी बीते लोकसभा चुनाव से कुछ ज्यादा अलग नही है, तब मोदी चेहरा थे अब नितीश, ताबड़तोड़  रैलियां, सभाएं, टीवी पे साक्षात्कार जितनी मोदी ने की थी , नितीश भी उतनी ही कर रहे हैं, जो PR एजेंसी मोदी के लिए काम करती थी वो अब नितीश के लिए कर रही है, इन सबके पीछे कारण  ये भी हो सकता है, अगर विभिन्नताओं की बात करे तो नितीश उतने सीट से चुनाव भी नही लड़ रहे जितना बहुमत के लिए चाहिए। 
खैर बात चुनाव में जीतने  या तैयारियों की करे तो अभी सिर्फ बात ही कर सकते  हैं यहाँ तक की अनुमान लगाना भी मुश्किल है, खुद मतदाता को नही पता की वो किसको वोट देने जा रहा  है, हालाँकि उत्तर प्रदेश और बिहार में  चुनाव के पहले वाली रात  में ही तय होता है कि  हम किसको वोट देंगे कल, कभी कभार तो लाइन में खड़े होने के बाद निर्णय लेते हैं,
जहा तक मै  महागठबंधन को देखता हु, एक बहुत ही सधा  हुआ तीर छोड़ा  है नितीश ने, मछली की आँख भेदने में ये सक्षम भी है और प्रयासरत भी , बस गाय, घर वापसी जैसे मुद्दे सर चढ़ के ना  बोलने लगे, क्यूंकि   ऐसा हुआ तो जात  पात  भूल के बात हिन्दू मुस्लमान पे आ जाएगी जैसे लोकसभा के चुनाव में हुआ था और बसपा जैसी पार्टी शून्य  पर आ गयी थी, इसलिए नितीश को यहाँ सेक्युलर वाले तीर को कमान में ही रखना होगा, वो कुछ नही बोलेंगे तब भी मुस्लमान उन्हें ही वोट देगा , वो अपने सुशासन और लालू अपने जात  वाले मुद्दे पर ही टिके  रहे तो बढ़िया होगा, बाकि ८-१० सीट उन्हें राहुल गांधी दिलवा ही देंगे। 
अब अगर बात चुनाव के महा रणनीतिकार अमित शाह की करू तो उनका कोई तोड़ नही, हर मुद्दे, हर व्यक्ति को वो लगा देंगे तो एक एक वोट के लिए, मोदी  जैसा दहाड़ने वाला वक्ता  कुछ जोशीले युवाओ में साइकिल के टायर में हवा का काम करेगा बस कुछ स्थानीय नेता उसे फुस्स  ना  करने की कोशिश करे, वैसे इन सबपे नजर रखने के लिए अमित शाह ने अपना अड्डा वही  बना रखा है। 
और अगर अब मै  दोनों विरोधियो को तराजू के पलड़े पर रख कर आँकु  तो ये साफ है कि  अभी तक दोनों बराबर हैं और अगर चुनाव के दिन तक बराबर ही रहे तो चुनाव बाद घर फुटौअल की नौबत जरूर आएगी और अगर कोई थोड़ा सा भी गड़बड़ाया तो दूसरा बाजी  मार  लेगा, जैसे लालू अभी फंस गए थे गाय  के मांस पर बोल कर  और मोदी  कुछ दिनों पहले DNA  वाला बयान   दे के, कल पहली बार लालू को पेपर पर लिखा देख कर भाषण देते हुआ सुना, हो सकता है damage  control की तैयारी हो और आगे कुछ ऐसा वैसा ना  बोल जाये उसके लिए सावधानी।
खैर मज़ा लीजिये चुनावी समर का, लड़ाई मज़ेदार है , रविश की ग्राउंड रिपोर्ट, ज़ी न्यूज़ का भाजपा प्रचार, आज तक का मोदी विरोध, रजत शर्मा का मोदी गुणगान, ये सब आपके enjoyment  में चार चाँद लगा देंगे,
बाकि जो है सो हइये  है, सही कहतानी ना  ?

Sunday, 4 October 2015

इंसान पहले

                        मेरे भी कल आंसू निकले तो  क्या मै  भी अब नापाक हूँ ,
                        रौंद  डालोगे मुझे बस इसलिए की मै  मियां अख़लाक़ हूँ

अंग्रेजो की दी हुई सौगात को  हम कब तक  ढोयेंगे, समझ नही आता , कब हम ये समझेंगे की हम इंसान पहले, हिन्दू मुस्लमान बाद में हैं , साक्षरता दर सत्तर प्रतिशत पहुंच गयी पर ऐसा लगता है  कि  सोच का प्रतिशत अभी भी शून्य  है।  हिन्दू घर वापसी में लगा हुआ है तो मुस्लमान जिहाद को पालने पोसने में , अगर यही घर वापसी पूंजा गोकुल दास मेघ जी की भी हो गयी होती तो हालत कुछ और होते, पर तब तो ये कह दिया गया की हिन्दू धर्म में जाने का रास्ता है आने का कोई रास्ता नही फिर आज काहे  की घर वापसी, ये दोहरा चरित्र क्यों ? और मुसलमानो के कौन से कुरान में लिखा गया है की जिहाद मतलब हिन्दुओ का क़त्ल ?
     अरे ये समाज के कुछ ठेकेदार हैं जो अपनी रोजी रोटी चलाने  के लिए रोज धर्म के नाम पर  मरने वाले राम सजीवन और मोहम्मद कयूम को खोज लाते  हैं , हम में से नब्बे प्रतिशत लोग इस बात को जानते भी हैं  और समझते भी हैं पर यही लोग मार  काट करने के लिए भी सबसे पहले आगे आते हैं।  
    एक बुजुर्ग को सिर्फ अफवाहों की वजह से मार  दिया गया ? अरे मारना ही है तो उनको मारो जिन्होंने भारत को गाय  का मांस निर्यात करने वाले देशो की श्रेणी में प्रथम स्थान पर ला कर खड़ा कर दिया है।  धर्म के बारे में सोचना है तो यहाँ सोचो ? कैसे भारत दूसरे स्थान से प्रथम स्थान पर आ  गया जबकि देश में उस पार्टी की सरकार है जो  गाय के मांस पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने की बात करती है ? गाय  के मांस पर पूर्ण प्रतिबन्ध होना चाहिए ये हिन्दू धर्म के लिए ही नही पुरे देश के हित  में है, पर एक हत्या के बाद दूसरी हत्या ? ये कही से भी उचित नही है , हम किसी भी पार्टी या धर्म को मानने  वाले हो ? पर हमें एक जान की कीमत का अंदाजा जरूर होना चाहिए, हमें ये जरूर सोचना चाहिए की वो किसी का बेटा  है, किसी का बाप है , हो सकता है पूरा घर उसके भरोसे जी रहा हो ? आज हमने एक अख़लाक़ को मारा तो  देखिये पुरे देश में  कही से राम सजीवन तो कही कन्हैया के मारे  जाने की खबर आ रही है , मीडिया इस मुद्दे को तब तक हवा देगी कब तक कोई बड़ा दंगा नही हो जाता क्युकि  उनकी रोजी रोटी उसी पे टिकी है, नेता इस मुद्दे पर तब तक राजनीति  करते रहेंगे  जब तक कि  कोई दूसरा अख़लाक़ नही मर जाता।  
 सारांश बस यह है की हमें अपनी सोच को उस स्तर  तक ले जाना होगा जहां  हम कोई निर्णय खुद ले सके, किसी के बहकावे ये कहे सुने में आ के ना  कुछ कहे ना  कुछ करें, क्युकि  अगला अख़लाक़ या राम सजीवन आप भी हो सकते है इसमें कोई दो राय  नही  ?? 

Wednesday, 23 September 2015

मैं हिन्दू हूँ

हिन्दू, मुसलमान या सेक्युलर होना, मै समझता हूँ गाली नही है, कट्टर होना भी एक हद तक ठीक है, पर एक दूसरे के घर में सेंध लगाना या सेंध लगाने के लिए कुछ भी बोलना या कुछ भी करना ये कही से भी ठीक नही है ?
मै हिन्दू हूँ और इस बात को मै बड़े शान से बोलता हूँ क्यूकि जो हिंदुत्व मैंने पढ़ा है वो सर्व धर्म सद्भाव सिखाता है, वैमनश्य कतई नही।  घर में जब पूजा होती है तो पूजा के ख़त्म होने के बाद पंडित जी हमेशा एक बात बुलवाते है , मनुष्य का उत्थान हो, विश्व का कल्याण हो, वो ये कभी नहीं बुलवाते की हिन्दू मात्र का कल्याण हो और बाकि धर्म का विनाश हो, जो लोग कट्टरता का चोला ओढ़े हुए हैं क्या उनके पास कोई और गीता पुराण है ? धर्म एक पहचान होता है, एक दिनचर्या होती है लड़ने का विषय नही, ये विचार का विषय हो सकता है पर विचारो को किसी पर थोपने की जुगत कभी नहीं।
धर्म में रुढ़िवाद हो सकता है जिसका समय दर समय समीक्षा और उन्मूलन जरुरी है, कल तक विधवा औरत को हर धार्मिक  कार्य से दूर रखना धर्म का हिस्सा था आज नही है, रजस्वला औरत को मासिक धर्म के दिनों रसोई घर में घुसने नही दिया जाता था आज वैसा नही है कुछ एक घरो को छोड़ दें तो , कहने का मतलब यही है की तब ये चलन बन गया था और फिर धर्म का एक हिस्सा, वजह वैज्ञानिक थे पर हमने इसको धर्म से जोड़ के देखा,
पहले तांबे के सिक्के पानी में फेंके जाते थे, वजह जल को और ऊर्जावान बनाना पर आज भी हम सिक्के फेंकते हैं जबकि आज सिक्के सिल्वर या लोहे के होते हैं और हम इसको धर्म का हिस्सा मानते हैं, ऐसे हज़ारो उदहारण हैं जिससे हम ये समझ सकते हैं की आज की दिनचर्या कल हमारे आदर्श बन जाते हैं, मैं ये नही कहता की अपने पूर्वजो की दी हुई सौगात को हम झुठलाए, पर उसके पीछे की वजह और आज परिस्थितियों को अवश्य ध्यान में रखे,
किसी अच्छी बात पर कट्टर बने  गलत रूढ़िवादी बात पर नही, धर्म का अनुसरण करे, प्रचार प्रसार करे पर थोपे नहीं।
वसुधैव कुटुम्बकम 

Monday, 14 September 2015

हिंदी दिवस

किसी को बोल दो की आपकी हिंदी थोड़ी ख़राब है तो वो खिस निपोर कर कहता है, You Know I am little poor in Hindi, और उसी इंसान को बोल दो की आपकी इंग्लिश थोड़ी Weak है तो तनुआ के कहता है How can you say this to me, you shoud focus on your English first, rather giving suggestion to anybody else ..और ना जाने कितनी डिगरिया गिनवा देगा इंग्लिश की, लोग इतना प्यार करते हैं अपनी मातृभाषा से?
कारण कई हैं, हमने हिंदी को इस तरह से परियोजित किया है अपने दिनचर्या के व्यवहार में तथा अन्य जीवनोपयोगी साधनो में कि वह  किसी को आकर्षित करती नही दिखती, भाषा का आकर्षण मात्र हिंदी उसके चरम पर नही पंहुचा सकती,
हिंदी का लोगो तक ना पहुचना और पहुचने की कोशिश भी ना करना, इसके पीछे सिर्फ वो जिम्मेदार नहीं है, बल्कि सरकार और कई सारे अन्य मशीनरिया जिम्मेदार हैं।  
गलती उनकी  कतई नही है जो हिंदी नही बोलते या नहीं बोलना चाहते,  जिस उपेक्षा भरी नजरो से देखा जाता है हिंदी बोलने वालो को कि उसकी मज़बूरी हो जाती है अपने आप को टिप टॉप बनाने की, अंग्रेजी बोलने की,   अगर हमें हिंदी को बढ़ावा देना है तो तो सबसे पहले सोच बदलनी होगी,  हिंदी बोलने वाले को ये आभास दिलाना होगा की हिंदी बोलना या जानना कोई अपराध नही, पर वो हिंदी जान के कर भी क्या लेगा ? वकील बना तो कोर्ट में बहस नही कर पायेगा, एप्लीकेशन नही लिख पायेगा, इंजीनियर बना तो प्रेजेंटेशन नही दे पायेगा , लेखक बना तो खाए बिना मर जायेगा
कोई दूसरी  भाषा जानना या उसमे पारंगत होना भी कोई अपराध नही, वो भी तब जब जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं उसमे ही सन्निहित हो, परन्तु अपनी भाषा को ना जानना या ना जानने की प्रवित्ति रखना कहा तक उचित है, दिल्ली विश्वविद्यालय के स्नातक वर्ग के परीक्षा में एक बार परीक्षार्थी ये पूछ रहे थे कक्ष  निरीक्षक से की अथवा का मतलब या होता है या और, कक्ष निरीक्षक मै था, सन्न रह गया था उस सवाल से.
बस मुझे युवा का हिंदी से इस तरह बेरुख हो जाना सताता है, और हिंदी का यूँ मजबूर हो जाना,
बाकी हिंदी दिवस की हिंदी में हार्दिक बधाई !

Saturday, 5 September 2015

गुरु गोविन्द

बचपन से मुझे एक ऐसे इंसान की तलाश थी जो मेरे हर छोटे ,बड़े गलत सही बात का जवाब दे सके और मुझे बता सके की क्या सही है क्या गलत है, हर गुरु पूर्णिमा जब माँ पिता जी अपने गुरु के पास जाते थे तो लगता था की क्या मुझे भी ऐसे गुरु मिलेंगे जिन्हे मै  दिल और दिमाग दोनों से गुरु मानूंगा ? प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा  तक कई पढ़ाने  वाले बताने वाले लोग मिले पर कोई गुरु नहीं मिला, हा श्री कृष्ण को मै  हमेशा अपने सैद्धांतिक गुरु मानता था, मानता हूँ , पर मुझे उस गुरु की तलाश थी जिसे मै  मुझे समझाते  हुए देख सकूँ, और जिसके सामने बैठ कर लगे कि  मै  तो कुछ जानता  ही नहीं, और मेरी तलाश एक दिन ख़त्म हुई जब कुछ महीनो पहले माननीय गोविंदाचार्य जी से मिला  और उनसे मिलकर लगा की मै  तो शून्य हूँ और वो ज्ञान की खान, जमीन से जुड़ा उनका अनुभव, २०० वर्ष आगे देखने की शक्ति, मनुष्य को उसके बोलने से आंकने का  हुनर, ना  जाने और कितने गुण  और ज्ञान से भरा है उनका मस्तिष्क , जीवन और देश का कोई ऐसा पहलु नही जिसपे उनका अनुभव और दूरदर्शी सोच ना  झलकती हो , मैंने अपने सामाजिक, राजनीतिक , शैक्षणिक दौर मै  गोविन्द जी जैसा विद्वान  ना  ही देखा ना  ही सुना और ना  ही भविष्य में किसी ऐसे अद्वितीय विद्वान से मिलने के आसार हैं क्यूंकि मै  नहीं समझता की जीवन के हर क्षेत्र का अनुभव और ज्ञान उनसे अच्छा  कोई रखता होगा , ऐसे गुरु गोविन्द , गोविन्द जी को गुरु गोविन्द वाले दिवस मै  शत शत नमन करता हूँ 

Sunday, 16 August 2015

Red Light

अरे उ वाला नहीं, लुप्लुपवा रेडलाइट की बात बात कर रहे हैं ,जिसके इशारे पर इंसान रुकने और चलने लगा है , रोड का भगवान भी कह सकते है उसे। इलाहाबद में अभी नवा नवा रेड लाइट लगा त , खबर पहुँचते पहुँचते पप्पू के मम्मी तक बात पहुंची , अब उ परेशान कइसन होत है ई नाशपीटी रेडलाइट ,ई कैसे रोक सकत है पप्पू के पापा को और उनका स्कूटर के , मतलब के अब हमरे अलावा पप्पू के पापा अब एहु के कहा मनीहे,दुपहरिया से शाम हो गयी , आज झपकी तक नहीं मारी बस इसी इंतज़ार में की कब पप्पू के पापा आये और उ स्कूटर पे बैठ के रेडलाइट देख के आएं , स्कूटर के हारन सुनते ही जैसे पीहर से कोई आ जाता है उस तरीके का आभास हुआ और मुस्कुराते हुए स्वागत हुआ पहली बार दफ्तर से आने के बाद , वो भी परेशान की आज क्या स्पेशल है जो बीस साल में नही हुआ वो आज हो रहा है , ई लो पानी पी लो और कपडा नहीं निकालना हम तनिक घूमने चलेंगे , तुम्हारे स्कूटर पे बैठे बहुत दिन हो हो गया , अमा तुम भी गजब करती हो , इतवार को चलना अभी बहुत थके हैं , हा हमें काहे ले के चलोगे , कभो ले के गए हो जो आज ले के जाओगे , २० साल हो गए एक साडी तक नही दिलाये घुमाओगे क्या , जाओ जा के खाना बना लो आज हमरी तबियत ठीक नही है... अजीब मुसीबत है यार पप्पू के पापा फुसफुसाते हुए , चलो भाई हम तो मज़ाक कर रहे थे बस। अब तैयारी शुरू , अच्छा इ बताओ जे इ रेडलाइट है ओमा खाली लाल रंग ही होत है , अरे नहीं भाई लाल ,पिला , हरा तीन रंग होते हैं , अब आधे घंटे बाद तीनो कलर कॉम्बिनेशन वाली चमचमाती साडी पहने स्कूटर पे बैठ के पहुंच गयी कीटगंज चौराहे , अच्छा ई है रेडलाइट , हा लाल हो तो रुकते हैं , हरी हो तो जाते हैं , अब दूसरे तरफ की लाइट लाल हुई तो स्कूटर से उत्तर के सोची सड़क क्रॉस कर लें चमचमाते हुए , पर ई तो अलाहाबाद के लड़के , अमा मारो अत्ति बत्ती कौन रुके , अब उधर से बाइक इधर से पप्पू की मम्मी, अब हो गया कॉम्बिनेशन, गिर पड़ी सड़क पे बाइक से टकरा के , कहानी लिखे जाने तक अस्पताल में भर्ती हैं और एक हाथ टूट गया है 

रातो रात दिग्विजय से खड्गे ?

                                                रातो रात दिग्विजय से खड्गे  ? एक बार फिर कांग्रेस में या यूँ कहें कि परिवार में राहुल गाँधी ...