Tuesday, 14 November 2017

प्यारीले रिश्ते

                 पथरीले हुए जा रहे हृदय और बनावटी रिश्तो के लिए मुझे इससे सटीक  शब्द  नहीं मिला, भविष्य में कोई मिलेगा तो परिवर्तन के लिए अवश्य सोचूंगा ! वैसे भी जिस विषय में लिख रहा हूँ, उसमे इतने परिवर्तन देखे हैं मैंने की इस रिश्ते के नाम तक से भरोसा उठ गया है।
                 आज जब आस पास देखता हूँ तो सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ   कि  क्यों हमारे रिश्ते गुड्डा गुड़िया के खेल से होते जा रहे हैं,  हालाँकि उनका भी रिश्ता प्रतीकात्मक रूप से एक साल तो चलता ही था, "था " क्योंकि अब वो खेल भी विडियोगेम  में परिवर्तित हो गया है।  आज अगर अपने आस पास दृष्टि  डाले  तो  समझ आता है कि  ये रिश्ते बोझ से बन गए हैं ?
              पति पत्नी अपने सास ससुर के साथ नहीं रह सकते क्योंकि उन्हें प्राइवेसी चाहिए, एक पडोसी अपने पडोसी के बारे में इसलिए नहीं जानना चाहता क्योंकि कही वो चाय पीने  ना  आ जाये उसके घर। 
                फेसबुक पर my लाइफ, माय स्वीट हस्बैंड कहने में पत्नी नहीं झिझकती पर बंद कमरे में अब पति ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन बन गया है, खैर अभी मैं  सिर्फ उस रिश्ते की बात करूँगा जो वाकई में रिश्ता रह ही नहीं गया है, बस एक दिखावा ,status सिंबल, या मात्र एक  दिनचर्या बन रह गया है , वो रिश्ता जो आपको सड़क पर चलते हुए, ऑटो के भीतर, मेट्रो, बस, थोड़ा high- fi हुआ तो hotels में  या यूँ कही हर जगह दिख जायेगा, पर दुर्भाग्य की बात है कि  बस दिखता  ही है, एक खोखला हो चूका रिश्ता, जँहा  ना  रिश्तो की समझ है ना उसकी कदर, तेरा/ तेरी  BF, GF  है तो मेरा/मेरी  भी है, वाली सोच ने हम युवाओ को  कहा ला के छोड़ा है, समझ नहीं पाता  हूँ ? महीने दो महीने में break up , tie  up कम  से कम मेरे समझ से तो परे  है।
आखिर क्यों इतना कमजोर हो गया है रिश्ता? वजह हम हैं या कोई और ?
              और सबसे ज्यादा दिखने वाला रिश्ता जो किसी के अभिव्यक्ति की आज़ादी है तो किसी के आंख की किरकरी, किसी के लिए just  having fun  है तो किसी के लिए जीने मारने का साथ, पर यह जीने मरने का साथ अब सिर्फ बातों में ही रह गया है, इसकी वास्तविकता महज एक खोखली कल्पना है। 
                जब हम किसी से जुड़ते हैं, तो एक भाव से , इस भाव की वजह  अभाव या प्रभाव या दोनों हो सकता है, मानता हूँ , पर जुड़ने के बाद भी अगर अभाव  और प्रभाव जैसे शब्द रिश्तो में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं तो वह कोई प्यार मोहब्बत नहीं, महज एक जरुरत है, और यह जरुरत इक्के दुक्के लोगो में नहीं अपितु हर किसी में पायी जाने लगी है, जरा सोचिये कैसे कोई बात आप पर या आपके रिश्ते पर इस कदर भारी पड़ जाती है कि आपका जन्मो जन्मो तक साथ रहने का वादा, कभी हाथ ना छोड़ने का वादा, सुख दुःख हमेशा साथ निभाने का वादा धरा का धरा रह जाता है, हम कुछ दिन शोक मनाते हैं और फिर किसी ऐसे  तथाकथित जीवनसाथी और प्यार की तलाश में निकल पड़ते हैं, मुझे समस्या हर रोज रिश्ते बदलने से नहीं , रिश्ते में किये गए वादे, देखे या मात्र दिखाए गए सपनो से है, अगर रिश्ता किसी विशेष प्रयोजन मात्र के लिए है तो यह पारस्परिक रूप से स्वीकृत होना चाहिए, किसी एक की सोची समझी साजिश नहीं।  
             और साजिश ना भी हो तो कम  से कम हमें यह जरूर सोचना चाहिए कि क्या कोई बात इतनी महत्वपूर्ण हो सकती है जो रिश्ता ख़त्म कर दे ? जब हम किसी से जुड़ते हैं तो उसके सुख दुःख, कमियाँ  अच्छाइयाँ , अच्छी बुरी सारी बातों से जुड़ते हैं, अगर किसी एक से कोई छोटी या बड़ी गलती हो भी जाती है तो यह आपका कर्त्तव्य है कि उसे सही करे, ना कि उसे उस अवस्था में छोड़ दें, ऐसे तमाशा देखने वाले तो सब हैं, फिर आप किसलिए ? सोचियेगा जरूर !!  किसी से नाता तोड़ने से पहले अपने वादों को एक बार याद जरूर करियेगा !!


                                                      !! रुदन !!

Sunday, 5 November 2017

तुम कौन हो ?

                                                            तुम कौन हो ?
कौन हो तुम ?
कई बार कौंधा है यह सवाल ,
तुम्हारे जेहन में ,
आँसुओ की गुफ्तगू में ,
आँखों के उछलते प्रेम में ,
मेरी बाँहों की उमड़ती दरिया में,
और प्यार के उस झंझावात में भी। 
                                     जवाब ?
                                     अब  भी अधूरा है !
                                     मेरी जिंदगी का और,
                                     तुम्हारे सवालो का !!
कौन हो तुम ? आखिर कौन हो तुम !
मेरी सांसो के चलने का जरिया तो नहीं ?
मेरी हंसी, मुस्कराहट का दरिया तो नहीं ?
कोई रंग ना चढ़े, वो रंग करिया तो नहीं ?
मेरे शब्द, मेरे प्रेम और इन आँसुओ का इकलौता जरिया तो नहीं ?
                                         या तुम ,
                                        आधार हो, अभिमान हो, जीवन  की हर मुस्कान हो !
                                        सम्मान हो, मेरी प्राण हो, मुश्किलों का समाधान हो !
                                         तुम कृष्ण हो, राधे हूँ , मै आध्यात्म , तुम विज्ञान हो !
                                         तुम प्रिये हो मै प्रियतमा, मै अधमरा तुम प्राण हो !
                                           
मेरी सृष्टि रचनाकार हो, क्या यही  तुम लाचार हो ?
मेरे जीव का आधार हो , कहो कैसे तुम निराधार हो ?
आचार हो, अनिवार्य हो , तुम रक्त का संचार हो।  
मै सूक्ष्म प्राणी मात्र हूँ, तुम ईश  का अवतार हो ! 
                           हे प्रिये ! तुम इस जीव के कण कण में विद्यमान हो !
                            सामर्थ्य हो हर पग की, तुम सर्व शक्तिमान हो !
                            संघर्ष हर धड़कन की , तुम जीव रूपी प्राण हो !
                            अभिराम हो, संकल्प हो, सौंदर्य का अभिज्ञान हो !
                             अब क्या कहूं तुम्हे हे प्रिये, तुम मेरी जीवनदान हो !!
                                              !! तुम मेरी जीवनदान हो !!

      

Wednesday, 1 November 2017

विधवा सड़क

                                                             !!   विधवा सड़क  !!
दिन भर दनदनाते और हिनहिनाते हम जब दो, तीन, चार या दस पहिया वाहनों को लेकर गिट्टी, तारकोल से बनी  सड़को को जब रौंदते हैं, तो हमें इसके रौंदे जाने का तनिक भी एहसास नहीं होता, मुझे भी नहीं हुआ था अभी तक, हाँ थोड़ी हमदर्दी हमें अपने पहियों की  होती  है जब सड़क अपनी बाँहों में कोई भारी  भरकम पत्थर रख कर लेट जाती है , या चोटिल होकर  गड्ढेनुमा घावों  से हमारा सामना  करवाती है , पर कभी ये एहसास हमें झकझोर नहीं पाया कि  सुग्घर दुल्हन जैसी सड़क कैसी खुरदरी सी हो गयी है ?
               कल रात  अचानक सुनसान सड़क पर निगाह पड़ी तो अनायास मुँह  से निकला देखो  जब पूरी दुनिया  दिन भर थक हार  के रात  के आगोश में अपनी पत्नी/ प्रियतमा के साथ चैन की नीद सो रहा है तब ये सड़क विधवा सी हो गयी है, पूरे  दिन अपने ऊपर कइयों  का भार  झेलने वाली अकेली शांत सी पड़ी हुई है एक अगली सुबह की इंतज़ार में , हालाँकि यह कहना कठिन है कि  वह अगली सुबह चाहती है या वह कोई सुबह नहीं चाहती ? इस सड़क को विधवा  कहना भी हालाँकि कहाँ तक सही है,  उसका आंकलन भी मै  अभी तक नहीं कर पा  रहा हूँ , कभी लगता है यह वह वैश्या  है जो पूरी जवानी रौंदी जाती है, चूसी  जाती है पर पूरे  जीवन में कोई उसका हमदर्द नहीं होता और ज्यों ही वह कही से टूटने  लगती है या बूढी होने  लगती है लोग उसका परित्याग करने लगते हैं जैसे टूटी और पुरानी  सड़क पर जाना कोई पसदं नहीं करता, जैसे  तुलनात्मक रूप से  महंगी होने के बावजूद  भी हम सुडौल और अच्छी दिखने वाली को ही अपनी पहली पसंद मानते है वैसे ही लम्बी दूरी  और टोल इत्यादि के खर्चो  के बावजूद भी हम सपाट सड़क पकड़ना पसंद करते हैं , कभी यह सड़क घर की उस जिम्मेदार महिला की तरह लगती है जो पति, पुत्र, सास ,ससुर, देवर इत्यादि अनेक रिश्तों को इतनी बखूबी से निभाती है और उनकी हर आवश्यकता पूरी करती है , अन्य शब्दों में सुबह नीद से जगाने से लेकर रात  में अच्छी नीद सुलाने तक का ठेका उसी के पास होता है , उसे अपने किसी भी काम की कोई शाबाशी कभी नहीं मिलती पर एक छोटी सी गलती का भी जिम्मेदार उसे ठहरा दिया जाता है।  
                  जैसे जीवन के किसी भी गलत का ठीकरा घर की स्त्री पर फोड़ दिया जाता है , जैसे बिस्तर पर आनंद से दूर होते हर क्षण का जिम्मेदार स्त्री को ठहरा दिया जाता है वैसे ही रास्ते की हर समस्या का जिम्मेदार सड़क को  ठहरा दिया जाता है, संयोग या वियोग की बात यह है कि  निर्जीव सड़क भी स्त्रीलिंग के रूप में ही प्रयोग होती है, यह भी एक शोध का विषय है कि  स्त्री की समानता के वजह से स्त्रीलिंग के रूप में प्रयोग हुआ या अन्य व्याकरण की  वजह से ??
                    हालाँकि इन सब के बावजूद भी, वह हमें अपने मंजिल तक जरुर पँहुचाती है, कोई थोड़ी देर से तो कोई समय से पहले, ठीक उसी तरह जैसे एक स्त्री एक पुरुष के जीवन को बिस्तर से लेकर जीवन के हर पथ तक उसे  मंजिल से मिलवाती है, अगर यह स्त्री और सड़क हमारे जीवन में नहीं में नहीं होती तो सोचिये जीवन कितना कठिन और अव्यवस्थित होता ? मंजिल तक पँहुचाने  वाला साथी ना  हो तो सोचिये, कैसा होगा सफर ? और हाँ एक बार इस सड़क के बारे में भी जरूर सोचियेगा ?? #रुदन 

Saturday, 21 October 2017

राधा बनना असंभव ही तो है

                                                 ! राधा बनना असंभव ही तो है !

बचपन में जब राधे कृष्ण और सीता राम  की ध्वनि कानो में पड़ती थी तो सबसे मेरा यही सवाल होता था कि  सीता तो राम की पत्नी थीं पर राधा ? उनका नाम कृष्ण के साथ क्यों, हालाँकि उसका जवाब अभी तक कोई दे नहीं पाया या जिसने भी दिया वह मुझे संतुष्ट नहीं कर पाया। 
             कृष्ण  प्रेम तो रुक्मिणी और अन्य रानियों से भी करते ही रहे होंगे, लगभग हर धार्मिक  पुस्तक में यही वर्णित है कि  रुक्मिणी लक्ष्मी की अवतार थीं फिर कृष्ण अवतार में राधा को वरीयता क्यों ? क्यों समाज राधा की अपने पति के साथ किये को गलत नहीं कह पाता  और कृष्ण के साथ प्रेम को पूजता है ? क्या जो लोग राधा को पूजते हैं वो अपनी पत्नी को किसी पराये पुरुष के लिए  राधा बन जाने देंगे या कोई स्त्री किसी पुरुष के लिए राधा बन जाने के लिए तैयार है ? शायद इन सारी बातों का जवाब हममे  से किसी के भी पास नहीं। 
             कृष्ण के पास भी शायद राधा के सवालो का जवाब नहीं रहा होगा, राधा के होने के बावजूद भी उन्हें रुक्मिणी या अन्य  रानियों की आवश्यकता ही क्यों पड़ी ? यदि अन्य रानियां थी भी तो राधा को उसका अधिकार क्यों नहीं मिला, क्यों राधा  को कृष्ण के महल में एक दासी बनकर रहना पड़ा ?  इतिहास इस बात को कभी नहीं बताता। 
             इन सारे  सवालो के जवाब मेरे पास भी नहीं है और शायद मै  इनके जवाब इसलिए ढूंढ  रहा हूँ क्यूँकि  मुझे अपने  मन मस्तिष्क को शांत करना है, मुझे  अपने आप को यह समझाना है शायद कि  मै जो कर रहा हूँ वह सही है ,  पर मेरा दिल कहता है कि  यह पाप है , अन्याय है उसके साथ जिसको राधा की संज्ञा दे दी है , मुझे ज्ञात है उसे राधा बनने की  नहीं रुक्मिणी बनने की इच्छा है, उसे अमर नहीं होना उसे जीना है, उसे इतिहास नहीं वर्तमान बनना है  और मुझे बनाना भी है पर ........ इस पर पे आकर घडी की सुई मानो  अटक सी गयी है, वह कहती  है बंद घडी भी दिन में दो बार सही समय दिखाती  है पर मैं तो एक बार भी सही समय दिखाने  लायक नहीं, महान  बनने की कोशिश करते करते घिन्न सी आने लगी  है खुद से, पर ना  जाने उसे अब तक मुझसे नफरत क्यों ना हुई ? मुझे खुद से हो गयी है पर उसे क्यों नहीं ? मुझे तो मुझसे ज्यादा जानती है फिर क्यों नहीं ? कल उसके फैसले में जो प्रण  था और आँखों में जो आंसू उन्हें जीवन की सबसे बड़ी हार मानता हूँ,उसे लगा उसके फैसले से बहुत खुश था मै, पर मेरी ख़ुशी के पीछे की आत्मग्लानि समझ नहीं पायी, गलती उसकी नहीं उसके व्यवहार की है, मेरी हर बुरी बात में अच्छा देखने का व्यवहार, मेरे  हर झूठ को सच मान  लेने का व्यवहार, मेरे साथ हर क्षण को जी लेने का व्यवहार, मेरी जिंदगी को अपनी साँस मान लेने का व्यवहार , वो समझ भी नहीं पायी कि  हर रण  में जीतने  वाला कल हार  गया।  पर मै तुम्हे नहीं हारने दूँगा, जीवन की हर जंग जीतोगी तुम, ये मेरी हार  है तुम्हारी नहीं, तुमने तो सर्वस्व दिया, जिसके लायक मै  था भी नहीं वह भी। 
             तुम राधा नहीं बन सकती, कभी नहीं, अगर बनी  तो हमारी हार  होगी, तुम हमेशा रुक्मिणी बनने के लिए ही हो और वही बने रहना, कभी किसी के लिए राधा मत बनना !! कभी नहीं !!

Tuesday, 1 August 2017

नीतीशे कुमार

                        बिहार में बहार  बा, नीतीशे कुमार बा, हालाँकि ई  अब्बो बा, पर आखिर बार बा !
व्यक्तिगत रूप से मै  नीतीश  कुमार के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित रहा हूँ , उनके बात करने का अंदाज, भाव भंगिमा सब एक ईमानदार नेता होने का संकेत  देती है, और शायद उनकी यही बात उनके अंदर पनप रहे कुछ और मसलो को बाहर  नहीं  देता। 
              पार्टी में कभी नंबर एक रहे जॉर्ज फर्नांडिस को कब चलता कर दिया, किसी को भनक तक नहीं लगने दी, शरद यादव जैसे जमीनी नेता को कब जमीन  पर ला दिया , उसका  एहसास खुद शरद  जी  को भी काफी  अर्सो बाद हुआ, हालाँकि राजनीति  में यह होना भी चाहिए, अगर आप बेहतर हैं तो कमतर को नीचा  करना ही पड़ेगा, नरेंद्र मोदी ने भी अगर लिहाज़ किया होता तो कभी प्रधानमंत्री नहीं बन पाते, पर यही उपेक्षा कभी कभार भारी  पड़  जाती है, हालाँकि यह कभी  कभार ही होता है हाँ कांग्रेस में यह अमूनन देखने को मिल जाता है।  
              नितीश ने  2014 में जब  त्याग की भावना दिखाकर और नैतिक जिम्मेदारी  के नाम पर अपना इस्तीफा  दिया था और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाकर वोट बैंक का पास  फेंका था, तब वोट बैंक की राजनीति  सधी या नहीं यह तो नहीं पता , पर उनके गले की गले की हड्डी जरुर बन गयी थी। आज जब फिर एक बार नितीश ने अपनी इमेज सुधारने या जो भी करने  के नाते इस्तीफा  दिया है, जहाँ तक मै  देख पा रहा हूँ, एक  बार फिर से उन्होंने अपने पैर  पर कुल्हाड़ी मार  ली है, और ऐसी कुल्हाड़ी जिसका जख्म कभी सूखेगा नहीं।  इस बात की आशंका मुझे थी की महागठबंधन जरूर टूटेगा पर, इतना जल्दी ? यह नहीं सोचा था, मेरे अनुसार यह कहानी 2019  तक जा सकती थी , पर मुझसे लाख गुना बड़े राजनीतिज्ञ श्रीमान अमित शाह ने मेरा सोचा गलत ठहरा दिया , अगर नितीश ने IB  के रिपोर्ट्स के अनुसार इस्तीफा दिया है तो उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि  इंदिरा गाँधी ने जब आपतकाल  लगाया  था, तब भी IB  ने यह रिपोर्ट दी थी कि मैडम चुनाव करवाइये , जनता बहुत खुश है और नतीजे आप सब के सामने हैं। 
बीजेपी 2019 में कितना बम्पर करेगी इसका अंदाजा  2018  के अंत तक हो जायेगा और अति बम्पर की स्थिति में बिहार का चुनाव बीजेपी गठबंधन में कतई  नहीं  लड़ेगी और उसका पूरा खामियाजा नितीश को भुगतना पड़ेगा , क्यूंकि जो वोट बैंक नितीश का है लगभग  वही वोट बैंक  बीजेपी का भी है, और लालू  के वोटो में सेंध लगाना लगभग नामुमकिन के बराबर है, और यह भी संभव है कि  लालू ने जानते हुए भी नितीश को जाने दिया हो, क्युकि  लालू जैसे घाघ नेता के दिमाग में क्या चल रहा है, यह किसी को नहीं पता।
             खैर जो भी हो, नितीश आज मुखिया हैं, कल हो ना  हो, यह बात नितीश को पता है या नहीं बस यह नहीं पता, एक बात की तारीफ जरूर करनी पड़ेगी उनकी कि  मौजूदा परिस्थियों को कैसे सम्भाला जाता है, यह उन्होंने सिद्ध किया है, बाकि भविष्य किसने देखा है !
              
              
              


















Tuesday, 7 February 2017

आरक्षण : दीमक या दवा

हिंदुस्तान, भारत, आर्यावर्त, सोने की चिड़िया, इंडिया  ना जाने और  कितने नामो से जाना जाता है अपना महान देश, और इसकी महानता पर गर्व है मुझे, ना जाने कितने किस्से सुने है वीरो के, बस एक कमी मैं देख पाता हूँ मुझे ये नही पता चल पाता कि फलाने राम ने  फला आरक्षण के अन्तर्गत आततायी  रावण को मारा, या फलाने आर्यभट्ट ने फला आरक्षण के अन्तर्गत गणित के सूत्रों का अविष्कार किया।
आज देश जब सबका साथ, सबका विकास जैसी नीतियों पर काम करते हुए यह कहता है कि आरक्षण किसी वर्ग विशेष का संवैधानिक अधिकार है तो बात गले से नहीं उतरती, वह संविधान जो  चौदहवे अनुच्छेद में यह व्याख्या करता है की सभी समान है , Right To Eqality  की बात करता है उसी देश के तमिलनाडु जैसे राज्य में सुप्रीम्र कोर्ट तक के आदेश को ताक पर रख कर लगभग 69  प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया जाता है। 
आरक्षण क्यों, कब तक , किसके लिए, किसी के लिए तो केवल उन्ही के लिए क्यों ? इन सारे सवालो का जवाब किसी के पास नहीं है , सत्ता में बने रहने के गंदे खेल ने नेताओ की मानसिकता को इतना खोखला कर दिया है कि ये प्रश्न उनके मन मस्तिष्क को कभी कौंधता ही नहीं है , विश्व के सर्वाधिक युवाओ वाले देश का युवा किस चैराहे पर आकर खड़ा है , उसकी परवाह करने वाला कोई नहीं है, पुरे विश्व के कुल 17. 5  प्रतिशत आबादी वाले देश भारत में विश्व की कुल  17  % आत्महत्याएं  दर्ज हुई हैं, क्या किसी ने ये जानने की कोशिश कि की ये आत्महत्याए क्यों हुई हैं ?
देश की तमाम संस्थाए और राजनीतिक  पार्टिया  जो  सर्व जन हिताय की बात करती हैं उनमे से क्यों किसी ने अभी तक इस विषय में बात करने तक की कोशिश नहीं की ? क्या ये ऐसा विषय है जिस पर बात नहीं की जा सकती ? क्या देश के एक वर्ग विशेष को ही आगे ले जाने की जरुरत है? क्या वह वर्ग जो दुर्भाग्यवश ऊँची जाति में पैदा हो गया है, उसे जीने का कोई अधिकार नहीं है ?
मुझे लगता है अब वह समय आ गया है जब देश का युवा किसकी क्या जात है, क्या धर्म है यह जानना नहीं चाहता , परंतु हमारा तंत्र कुछ ऐसा है कि ना चाहते हुए भी वह इन चीजो में लिप्त हो जाता है।
मुझे लगता है अब समय आ गया है जब देश का युवा चाहे वह समाज के किसी वर्ग से हो, इस मुद्दे पर बहस करेगा और इस दीमक से देश को खोखला होने से बचाएगा !! जय हिन्द !!
 

Saturday, 21 January 2017

कवयित्री सम्मलेन ही क्यों

मेरे कई मित्रो और जानने वालो ने पूछा की कवयित्री सम्मलेन क्यों ? कवि सम्मलेन क्यों नही ?
मेरा जवाब था कवयित्री सम्मलेन क्यों नही ? उस जवाब के जवाब में इधर उधर की बातें , कुछ ज्ञान कुछ दकियानूसी सोच, कुछ तो कुछ भी , ये जवाब उन सभी ऐसा सोचने वालो के लिए है...

भारत जैसे पुरुष प्रधान देश जहाँ हमेशा से  ही औरतो को एक हासिये पर रखा गया, उनके हौसले, प्रतिभा, करतब, जज्बे को एक मज़ाक के अलावा कुछ नही समझ गया, उस पुरुष प्रधान देश जहाँ अस्पताल के बाहर ये लिखना पड़ता है कि यहाँ लिंग परीक्षण नही होता, जहाँ सिर्फ नारी को अपने आप को पाक साफ दिखने के लिए अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता हो, उस देश में ये कल्पना करना कि उनके नाम पर या उन्हें धयान में रख कर किसी विषय में सोचा गया हो, एक अतिशयोक्ति ही होगी , अगर हम कविता की भी बात करें  तो  केवल कवि सम्मलेन, क्या कवि ही सोच सकता है ? क्या वही लिख सकता है ? तो फिर उसके नाम  का ही  सम्मलेन क्यों ?
वो नारी  जो माँ है, बहन है, प्रेयसी है, एक परिवार का आधार है ,जिसके दिल में अथाह प्रेम का सौन्दर्य है , जो अपनी बाते अगर कविता में कहना शुरू करे तो मैं समझता हूँ बड़े बड़े कवि ढिगने से प्रतीत होंगे और ऐसा हुआ भी है।   महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान का नाम जहाँ आ जाये वहाँ हमें और किसी  कवि की सुध नहीं रहती पर क्यों सिर्फ गिने चुने नाम ही हैं जब बात कवयित्रियों की आती है तो , वजह सिर्फ एक उनकी उपेक्षा !!
आज भी हर रोज कही ना कही कवि सम्मेलन होते रहते हैं हालाँकि कवयित्रिओं को भी मौका दिया जाता है पर कवि सम्मलेन ही क्यों ? कवयित्री सम्मलेन क्यों नहीं ?
बस इसी प्रश्न ने मुझे ये आयोजन और एक शुरुआत करने की शक्ति और प्रेरणा दी, और इस मुहीम को  एक मुकाम तक ले जाऊंगा इस बात का मुझे पूर्ण विश्वास है। .
जय हिन्द !!

रातो रात दिग्विजय से खड्गे ?

                                                रातो रात दिग्विजय से खड्गे  ? एक बार फिर कांग्रेस में या यूँ कहें कि परिवार में राहुल गाँधी ...